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Raag parichay of Malgunji raag Description notes I Aaroh Avaroh in hindi

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राग मालगुन्जी

 द्वै मध्यम कोमल रिखब, पंचम सुर बरजोई।

सम सम्वादी वादी ते, ललित राग शुभ होई।।

                                                             

Hindi notes of Malgunji / राग मालगुन्जी का परिचय 

Malgunji Raag description / information in detail-

इस राग का जन्म काफी थाट से माना गया है। इसमें दोनों गंधार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध नि अति अल्प है। शेष स्वर शुद्ध लगते है। आरोह में प वर्ज्य है और अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए यह षाडव- सम्पूर्ण जाति का राग है। वादी म और संवादी सा है। इसके गाने बजाने का समय रात्रि का दूसरा प्रहर है।

आरोहनि सा रे ग– म, ध नि सां।

अवरोह सां नि ध, पम ग म, रे सा।

पकड़नि सा रे ग, रेगम   रे सा।

वर्ज्य स्वर – आरोह में प वर्ज्य है

थाट – काफी थाट

वादी -सम्वादी स्वर – म – सा

जाति -षाडव- सम्पूर्ण

गायन समय -रात्रि का दूसरा प्रहर है।

राग मालगुन्जी की विशेषता

  • साधारणतः आरोह में शुद्ध ग और नि तथा अवरोह में कोमल ग और नि प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध निषाद का अति अल्प प्रयोग केवल तार सा के साथ आरोह में होता है- जैसे रें सां, नि सां, अन्यथा आरोह में भी कोमल नि प्रयोग किया जा सकता है। मंद्र सप्तक के आरोहात्मक और अवरोहात्मक दोनों प्रकार के स्वरों में कोमल नि प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान केवल कोमल नि प्रयोग करते है, शुद्ध नि प्रयोग करते ही नहीं।
  • पंचम स्वर आरोह में वर्ज्य है और अवरोह में अल्प  है। ध से म को आते समय पंचम को आते है।
  • शुद्ध नि का अल्पत्व, कोमल नि की अधिकता, मध्यम का बहुत्व और पंचम का अल्पत्व तथा लगभग बागेश्वरी के समान चलन होने के कारण इसे बागेश्वरी राग का अंग कहते है।

न्यास के स्वर सा, ग, म और ध।

समप्रकृति राग बागेश्वरी।

विशेष स्वर संगतियाँ

  • नि सा रे ग – म,
  • ध पम ग- म, रे सा,
  • ग, रेगम – रे सा,
  • म ध नि ध, पमग – म,
  • सां, नि धप म – ग म रे सा।

Raag parichay of all raags in Indian Classical music..

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