swar in music

Pracheen Granth karo ke Sudha Swar & Vikrit Swar in Hindi

Pracheen Granth karo ke Sudha Swar & Vikrit Swar in hindi is described in this post of saraswati sangeet sadhana.

प्राचीन ग्रन्थकारों के शुद्ध तथा विकृत स्वर-

  • प्राचीन काल से आजतक एक सप्तक के अन्तर्गत 22 श्रुतियाँ मानी जाती रही है। इनके नाम है – छन्दोवती, दयावती, रजनी, रक्तिका,रोद्री, क्रोधा, वज्ज्रिका, प्रसारिणी, प्रिति, मार्जनी, क्षिति, रक्ता, सन्दिपनी, अलापिनी, मदन्ती, रोहिणी, रम्या, उग्रा,क्षोभिणी, तीव्रा, कुमुद्वती और मन्दा। इन्हीं 22 श्रुतियों पर विभिन्न विद्वानों ने शुद्ध तथा विकृत स्वरों को अपने अपने ढंग से स्थापित किया। विद्वानों में भरत, शारंगदेव, अहोबल, लोचन, पुन्डरीक बिट्ठल, रामामात्य, सोमनाथ आदि है। इन सबका मत एक सप्तक के अन्तर्गत श्रुतियों और शुद्ध स्वरों की संख्या और स्वरों की स्थापना में एक है। प्रत्येक ने शुद्ध स्वर को निर्धारित श्रुतियों में से उनकी अंतिम श्रुति पर स्थापित किया है।

भरत के स्वर –  भरत ने सात शुद्ध स्वरों के साथ साथ दो विकृत स्वर माने है – अन्तर गंधार और काकली निषाद। सातों शुद्ध स्वरों को क्रमशः चौथी, सातवीं, नौवीं, तेरहवी, सतरहवीं, बीसवीं और बाइसवीं श्रुति पर स्थापित किया है। अन्तर गंधार ग्यारहवीं पर और काकली निषाद दूसरी श्रुति पर स्थापित किया है। इन्हें भरत ने स्वर साधारण कहा है।

शारंगदेव के शुद्ध और विकृत स्वर- शारंगदेव के समय में विकृत स्वरों की वृद्धि हुई। शारंगदेव ने पहले पहल भरत के अन्तर गंधार और काकली निषाद के अतिरिक्त अनेक विकृत स्वरों की भी कल्पना की जिनकी कुल संख्या 12 थी। इस प्रकार उसने कुल 7 शुद्ध और 12 विकृत, कुल 19 स्वर माना।

  • 1ली श्रुति पर कौशिक नि,2री पर काकली नि, 3री पर च्युत षडज, 4थी पे षडज, 5वी पर कौशिक षडज, 6वीं पर अन्तर षडज, 7वी पर शुद्ध ऋषभ, 8 वी पर विकृत ऋषभ, 9वीं पर शुद्ध ग, 10 वीं पर साधारण ग, 11वी पर अन्तर ग, 13वीं पर म, 14वीं पर कौशिक मध्यम, 15वी पर विकृत मध्यम, 16वी पर मध्यम ग्राम पंचम, 17 वी पर प ,18 वीं पर मध्यम ग्राम धैवत, 20 वीं पर शुद्ध ध और 22वीं पर शुद्ध नि स्थापित किया।

लोचन के शुद्ध और विकृत स्वर:-

  • लोचन ने ‘राग तरंगिणी’ नामक पुस्तक में शुद्ध तथा विकृत स्वरों की स्थापना की। उन्होंने भी अन्य विद्वानों के समान सातों स्वर की श्रुतियाँ क्रमशः 4-3-2-4-4-3-2 माना है तथा प्रत्येक स्वर अपनी अन्तिम श्रुति पर स्थापित किया। इसलिये षडज चौथी श्रुति पर स्थापित हुआ।
  • प्रथम पर तीव्र निषाद, 2री पर काकली निषाद, 3री पर तीव्रतम निषाद, 4थी पर षडज, 6ठी परकोमल ऋषभ, 7वीं पर शुद्ध ऋषभ, 9वीं पर शुद्ध गंधार, 10वीं पर तीव्र गंधार, 11वीं पर तीव्रतर गंधार, 12वीं पर तीव्रतम गंधार, 13वी पर शुद्ध मध्यम, 14वी पर तीव्र मध्यम, 15वीं पर तीव्रतर मध्यम, 17वीं पर पंचम, 20वीं.पर धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद स्थापित किया। इन स्वरों को देखने से ऐसा लगता है कि उनके समय में गंधार और निषाद को बहुत महत्व दिया जाता था। और यह परम्परा भरत के समय में मालूम पडती है।

राममात्य के स्वर:-

  • इन्होंने सन्1550 के लगभग ‘ स्वरमेलकलानिधी’ नामक पुस्तक में शुद्ध तथा विकृत स्वरों को विभिन्न श्रुतियों पर इस प्रकार स्थापित किया है कि 1ली पर कौशिक निषाद, 2री पर काकली निषाद, 3री पर च्युत षडज निषाद, 4थी पर षडज, 7वी पर शुद्ध ऋषभ, 9वीं पर गंधार, 10वीं पर साधारण गंधार, 11वीं पर अन्तर गंधार, 12 वीं पर च्युत मध्यम गंधार, 13वीं पर मध्यम,16वीं पर च्युत पंचम, 17वीं पर पंचम, 20वीं पर धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद स्वर स्थापित किया।
  • इनके शुद्ध स्वर तो अन्य ग्रन्थकारों के समान है परंतु विकृत स्वरों में कुछ अन्तर है। चार विभिन्न श्रुतियों को गंधार और निषाद की संज्ञा और तीन विभिन्न श्रुतियों को क्रमशः ऋषभ और धैवत की संज्ञा दी है। इस प्रकार कुल मिलाकर 14 स्वर माने है और गंधार निषाद के दो – दो नाम रखे है।

पुन्डरीक बिट्ठल के शुद्ध और विकृत स्वर:-

पुन्डरीक बिट्ठल ने रागमाला ग्रंथ में 22श्रुतियों पर अपने स्वरों की स्थापना इस प्रकार की है- 1ली श्रुति पर एकगतिक निषाद, 2री पर द्विगतिक निषाद, 3री पर तृगतिक निषाद, 4थी पर षडज, 7वीं पर ऋषभ, 8 वीं पर 1गतिक ऋषभ, 9वीं पर गंधार या द्विगतिक ऋषभ, 10 वीं पर एकगतिक गंधार, 11वीं पर द्विगतिक गंधार, 12वीं पर तृगतिक गंधार,  13वीं मध्यम, 14वीं पर एकगतिक म, 15वीं पर द्विगतिक म, 16 वीं तृगतिक म, 17वीं पर पंचम, 20वीं पर धैवत, 21वीं पर निषाद स्वरों की स्थापना की। इस प्रकार उन्होंने विकृत स्वरों को एक नवीन नाम दे दिया जिसे गतिक कहा।

  • शुद्ध स्वरों को अन्य ग्रन्थकारों के समान ही माना है।

सोमनाथ के स्वर:-

  • राग विवोध नामक ग्रन्थ में सोमनाथ ने अपने स्वरों के स्थान विभिन्न श्रुतियों पर निश्चित किया है। 1ली श्रुति पर कौशिक नि, 2री पर काकली नि, 3री पर मृदु षडज, 4थी पर षडज, 7वीं पर ऋषभ, 8वीं पर तीव्र ऋषभ, 9वीं पर गंधार, 10वीं पर साधारण गंधार, 11वीं पर अन्तर गंधार, 12वी पर मृदु मध्यम, 13वीं पर मध्यम, 14वीं पर मृदु पंचम, 17वीं पर पंचम, 20 वी पर धैवत, 21 वीं पर तीव्र धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद की स्थापना की।
  • इनके स्वरों को देखने से यह स्पष्ट है कि उन्होंने तीध विभिन्न श्रुतियों पर गंधार और निषाद स्वरों को क्रमशः स्थापित किया है। ऋषभ और धैवत के कुल दो रूप माने है और चार विभिन्न श्रुतियों पर मध्यम माना है। इससें यह स्पष्ट है कि उनके समय में गंधार, मध्यम, और निषाद स्वरों को अधिक महत्व दिया जाता था। सा, म, और प के भी विकृत रूप स्वीकार किये गए हैं जिन्हें उन्होंने मृदु नाम दिया। यह उनका नवीन नाम था।

व्यंकटमुखी के स्वर:-

  • दक्षिण भारत के पंडित व्यंकटमुखी ने 17वीं शताब्दी में चतुर्दण्डिप्रकाशिखा नामक एक ग्रन्थ लिखा जिसमें उन्होंने अपने स्वरों का वर्णन किया है। उन्होंने 7 शुद्ध और 5 विकृत स्वर माने है, जिनके नाम है साधारण गंधार, अंतर गंधार, वराली गंधार, कौशिक और काकली निषाद। उन्होंने शुद्ध गंधार और.साधारण गंधार के तथा शुद्ध और कौशिकी निषाद के दो-दो नाम रखें।
  • शुद्ध गंधार को पंचश्रुति ऋषभ, साधारण गंधार को षटश्रुति ऋषभ, शुद्ध निषाद को पंचश्रुति धैवत और कौशिकी निषाद को षटश्रुति धैवत भी कहा है। इन्हीं स्वरों से उन्होंने 72 मेलों की उत्पत्ति बताई है। कुछ विद्वानों का मत है कि व्यंकटमुखी  से 300 वर्ष पहले ही 72 थाटों का आविष्कार हो चुका है।

अहोबल के स्वर:-

  • ‘संगीत पारिजात’ स्वर की दृष्टि से बडा महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह ग्रंथ 1650 में लिखा गया, जिसमें बाइसो श्रुति पर कोई न कोई स्वर स्थापित करके एक नई विचारधारा का श्री-गणेश हुआ। 7 श्रुतियों के दो – दो नाम दिये है। 7शुद्ध, 8 कोमल और 14 तीव्र, कुल मिलाकर 29 स्वर माने है, किन्तु श्रुतियाँ 22 ही मानी है।
  • वीणा पर स्वरों की स्थापना करते समय 12.स्वरों को ही मुख्य माना है। अति विकृत स्वरों की चर्चा गौण रूप से की है।
  • शुद्ध स्वरों के स्थान अन्य विद्वानों से अलग नहीं है। प्रथम श्रुति पर तीव्र निषाद, 2री श्रुति पर तीव्रतर निषाद, 3री पर तीव्रतम निषाद, 4थी पर षडज, 5वी पर पूर्व ऋषभ, 6वीं पर कोमल ऋषभ, 7वीं पर शुद्ध ऋषभ, 8वीं पर तीव्र ऋषभ या कोमल गंधार, 9वीं पर तीव्रतर ऋषभ या शुद्ध गंधार, 10 वीं पर तीव्र गंधार, 11वी श्रुति पर तीव्रतर गंधार, 12 वीं पर तीव्रतम गंधार, 13वीं पर शुद्ध मध्यम, 14वीं पर तीव्र मध्यम, 15वीं पर तीव्रतम मध्यम, 16वीं पर तीव्रतम मध्यम, 17वीं पर पंचम, 18वीं पर पूर्व धैवत, 19वीं पर कोमल धैवत, 20वीं पर शुद्ध धैवत, 21 वीं पर कोमल निषाद तथा 22वीं श्रुति पर शुद्ध निषाद स्थापित किया।
  • संगीत पारिजात की मुख्य विशेषता यह है कि एक तरफ उन्होंने पुरानी परम्परा को मानते हुए 22श्रुतियों पर स्वरों की स्थापना की है और दूसरी ओर वीणा के तार पर 7 शुद्ध और 5 विकृत स्वर स्थापित करके आधुनिक स्वरों का स्थान खोला है। संगीत के इतिहास में सर्वप्रथम उन्होंने ही वीणा के तार पर स्वरों का स्थान निश्चित किया।
  • अहोबल के समय तक किन्हीं भी दो स्वरों की दूरी श्रुति द्वारा आंकी जाती थी, किन्तु अहोबल के समय से एक नये अध्याय का सूत्रपात हुआ और तार की लम्बाई द्वारा स्वरों की दूरी निश्चित की जाने लगी।
  • हम सभी जानते है कि वर्तमान काल के वैज्ञानिक युग में तार की लम्बाई और फलस्वरूप आंदोलन संख्या का कितना महत्व है।

Click here for Defination of all terms in Indian classical music..

Description of Swar , Dhwani , Shruti , Naad in indian classical music in hindi is described in this post of saraswati sangeet sadhana.

Click here For english information of this post ..   

Some posts you may like this…

4.6/5 - (5 votes)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top