Sarana Chatushtai in music

Sarana Chatushtai in Music in Hindi सारणा चतुष्टयी

Sarana Chatushtai in Music in Hindi is described in this post available on saraswati sangeet sadhana

Sarana Chatushtai in Music in Hindi

सारणा चतुष्टयी

भरत ने २२ श्रुतियों को सिद्ध करने के लिए वीणा पर जो प्रयोग किया है उसे सारणाचतुटई कहा गया है।सर्वप्रथम उसने दो सर्व या समान वीणा लिया ।उनदो वीणाओं में जितनी भी बातें समान हो सकती थीं उन्हें माना, जैसे समान आकार हो तुम्बा छोटा-बड़ा न हो, तार एक ही धातु के हो तथा एक ही स्वर सप्तक में दोनों वीणा स्वर बद्ध हो इत्यादि इत्यादि। इतना ही नहीं छेड़ने का कोण भी एक जैसा हो और सारणा प्रक्रिया भी एक ही व्यक्ति द्वारा सम्पन्न हो ।

द्वै बीणेतुत्यप्रमाणतन्त्र्युपवादनदंडमूछनेषड़जग्रामाश्रितेकायें’।

-नाट्यशास्त्रपृष्ठ४३३

उसने एक वीणा को प्रमाण के लिये रख दिया और दूसरे पर प्रयोग करना शुरू किया सुविधा के लिये प्रथम को ध्रुवया अचल वीणा और द्वितीय को अध्रुवयाचल वीणा कहा। उसने चल वीणा पर ही प्रयोग करना शुरू किया जो इस प्रकार है –

प्रथमसारणा

दोनों वीणाओं में पञ्चम सत्रहवीं श्रुति पर था । सर्व प्रथम उसने चल वीणा के पंचम को एक श्रुति इतना उतारा कि ऋषभ के साथ षडज – मध्यम भाव स्थापित हो गया। भरतनेषडज-मध्यम भाव में ९ श्रुतियों की दूरी माना । उसका रे सातवी  श्रुति पर हैं , अतः सोलहवीं श्रुति पर स्थापित पंचम से सा –म भावस्थापित होगा । फल स्वरूप पंचम सोलहवीं श्रुति पर आगया और मध्यम ग्राम की सी रचना हो गई । इस के बाद इसी पंचम को षडज ग्राम का पंचम मानकर शेष सभी स्वरों को एक –एक श्रुति कम कर चल वीणा को पुनः षडज ग्राम में परिवर्तित कर दिया । इन क्रियाओं द्वारा प्रथम सारणा की रचना हुई । भरतने १७ वीं और १६ वीं श्रुति के बीच के अंतर कोप्रमाणश्रुतिकहा। अब चल वीणा के सातों स्वर क्रमशः ३,६,८,१२,१६.१९ तथा २१वीं श्रुति परआगये। भरत के शब्दों में ,

तामेवपंचमशातषडजग्रामकीकुर्य्यात।

प्रमाण श्रुति के लिये भरत ने कहा है ,

षडजग्रामेतुश्रुत्यपकृष्टःपंचमकार्यः।पंचमश्रुत्युत्कर्षादपकर्षाद्वायदतरमार्दबायत्वाद्यत्प्रमाणं श्रुति।

अर्थात षडज ग्राम के पंचम को एक श्रुति उतार देने से मध्यम ग्राम के पंचम और षडज ग्राम के पंचम में जो अन्तर आता है वह प्रमाण श्रुति है ।

द्वितीयसारणा

दूसरी सारणा में भरत ने सर्व प्रथम पंचम को एक श्रुति नीचा किया, तत्पश्चात् उसी पंचम को पुनः षडज ग्राम का पंचम मानकरअन्य स्वरों को १-१ श्रुति नीचा कर दिया । प्रथम सारणा में पंचम १६वीं श्रुति पर था और अब द्वितीय सारणा में १५वी श्रुति पर आ गया । पंचम को १५वीं श्रुति पर करने से मध्यम ग्राम की और अन्य स्वरों को १-१ श्रुति कम क र देने से षड़ज़ ग्राम की रचना हुई । इस दूसरी सारणा के बाद भरत ने दोनों वीणा के स्वरों में तुलना की और देखा किचल वीणा का गंधार और निषाद अचल वीणा के रिषभ और धैवत से क्रमशः मिल गये हैं , क्योंकि अब चल वीणा के सातो स्वर क्रमशः २,५,७,११,१५,१८ और २०वीं श्रुतियों पर आ गये हैं ।

पुनरपितवदेवापकर्षाद्गांधारनिषादवतवितरस्यांधैवतर्षमप्रविशतः (द्विश्रुत्यधिकत्वात्।)”

तृतीयसारणा-

तीसरी सारणा की रचना करते समय भरत ने प्रथम दो सारणाओं की तरह सर्व प्रथम पंचम को १ श्रुति कम कर मध्यम ग्राम की सृष्टि की और इस नवीन पंचम कोष डज ग्राम का पंचम मानकर अन्य श्रुतियों को षडज पंचम भाव के अनुसार १-१ श्रुति कम कर दिया , अतः तीसरी सारणा के अंत में वीणा पुनः षडज ग्राम में आ गया और सातों स्वर क्रमशः १,४,६,१०,१४,१७ और १९ वीं श्रुति पर आ गये । दोनों वीणाओं को पारस्परिक मिलाने से उसने देखा कि चल वीणा का रे और ध अचल वीणा के क्रमशः सा-प से तादात्म हो गये हैं ।

पुनस्तवदेवाकर्षाद्धैवतर्षभावितरस्यापंचमषडजौप्रविशतः (भि) श्रुत्वधिकत्वात्।

चौथीसारणा-

प्रयोग के इस अंतिम चरण में भरत ने अन्य सारणाओं के समान सर्व प्रथम पंचम को एक श्रुति कम पर स्थित किया और उस के बाद अन्य स्वरोंको भी एक एक श्रुति नीचा किया । इस सारणा में पंचम १३वीं श्रुति परआगया, क्योंकि तीसरी सारणा में पंचम १४ वीं पर था । इस प्रकार केवल पंचम ही नहीं, वरन्सभी स्वर अचल वीणा की तुलना में ४-४ श्रुति नीचे हो गये। चौथी सारणा की क्रिया के पश्चात भरत ने अचल और चल वीणा के स्वरों को मिलाया । उसने देखा कि चल वीणा का पंचम, मध्यम और षडज क्रमशः अचल वीणा के मध्यम, गन्धार और मन्द्र नी से तादात्म हो गये है ।

‘तदक्त्पुनरपकृष्टायां च तस्यां पचममध्यमषडजा इतरस्यां मध्यम गांपार निषादव प्रवेक्ष्यन्ति चतुः श्रुत्यधिकत्वात् ।

भरत की सारणा प्रक्रिया को कार्यान्वित करने में विद्वानों में थोड़ा मतभेद है, किन्तु उद्देश्य सब का एक है। आधुनिक समय में भरत की श्रुतियों का मान गणित द्वारा  निकाला जा चुका है, जिससे यह सिद्ध होता है कि उसकी श्रुतियाँ समान दूरी पर नहीं। है। उसके स्वर-सप्तक में ३ प्रकार की श्रुतियाँ मिलती हैं

पहली प्रकार की श्रुति का गुणांतर८१/८० या ५ सेवर्ट हैं।

दूसरी -३५६/३४३ या २३

तीसरी-२५/२४या १८

प्रथम सारणा की श्रुतियों का मान ५ सेवर्ट या एक कोमा होता है। दूसरी सारण की श्रुतियों का मान २३ सेवर्ट है। तीसरी सारणा की श्रुतियों का मान १८ सेवर्ट और चौथी सारणा की श्रुतियों का मान पुनः ५ सेवर्ट है। इस दृष्टि से ४ श्रुतियों का अन्तराल ५१ सेवर्ट के, ३ श्रुतियों का अन्तराल ४६ सेवर्ट के और २ श्रुतियों का अन्तराल २८ सेवर्ट के बराबर है।

शारङ्गदेव की सारणा प्रक्रिया

शारङ्गदेव ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सङ्गीत रत्नाकर’ में सारणा प्रक्रिया का वर्णनकिया है। उसने भरत से अलग होकर चीणा में २२-२२ तार बाँधे हैं। इन तारों को इसप्रकार रखा कि हर अगला तार अपने पिछले तार से थोड़ा ऊँचा रहे और उनके बीचकोई ध्वनि न सुनाई दे। इस दूरी को उसने प्रमाण श्रुति’ कहा। इस प्रकार बाइसो तारको स्वरबद्ध करने के बाद ४थे तार पर सा, ७वें पर रे, ९वें पर ग, १३वें पर म १७पर ध, २०वें पर ध और २२वें तार पर निषाद स्वर की स्थापना की और षडज ग्रामतैयार किया। इसके बाद उसने अचल वीणा को प्रमाण के लिये रख दिया और चलवीणा पर भरत के समान प्रयोग प्रारम्भ किया। आगे उसने २२ श्रुतियों को सिद्ध करनेकी चेष्टा की, किंतु जब २२ श्रुतियाँ पहले से ही निश्चित कर ली थीं तो उन्हें सिद्ध करनेका प्रश्न ही नहीं उठता।

भरत द्वारा बताई गई सारणा प्रक्रिया करने से यद्यपि २२ श्रुतियाँ प्रत्यक्ष हो जाती। किंतु एक साथ बाइसो श्रुतियाँ प्राप्त नहीं होती। एक सारणा से दूसरी सारणा पर से प्रथम सारणा के स्वर गायब हो जाते हैं। शायद इसी कारणवश शारदेव ने २२ तार बांध थे जिससे सभी स्वर एक साथ स्पष्ट हो सकें।

Swar Sadhana in Music in Hindi is described in this post

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