Shruti in Music in Hindi

SwarMalika in Music in Hindi ठुमरी गायन शैली is described in this post . Learn indian classical music theory in hindi .

Shruti in Music in Hindi

श्रुति और स्वर

श्रुति का शाब्दिक अर्थ है ‘श्रुयते इति श्रुतय’ अर्थात जो कुछ कानों द्वारा सुना जाये वह श्रुति है। श्रुति की उत्तपत्ति श्रु धातु से हुई है जिसका अर्थ है सुनना। शास्त्रों में कहा गया है,’ श्रवणेन्द्रिय ग्राहयत्वात ध्वनिरेव श्रुतिभवेत’ अर्थात कानों द्वारा ध्वनि ग्राह्य होने के कारण इसे श्रुति की संज्ञा दी गई हैं। संगीत में इस श्रुति के इस व्यापक अर्थ का प्रयोग नहीं किया गया है। कारण, सभी ध्वनियां नाद नहीं है। सप्तक के असंख्य नादों में से जिन्हें सुना जा सके तथा जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकें, उन्हें संगीत में श्रुति कहा गया है।

प्राचीन काल में अधिकांश विद्वानों ने तथा आधुनिक विद्वानों ने एक सप्तक के अन्तर्गत 22 श्रुतियाँ मानी है और अनुभव यह बताता है कि 22 श्रुतियों पर नियंत्रण पाना बडा मुश्किल है। महर्षि भरत, शारंगदेव तथा बाद के अन्य सभी विद्वानों ने इतनी ही श्रुतियाँ मानी।

अब यह प्रश्न उठता है कि 22 श्रुतियाँ समान दूरी पर फैली है अथवा असमान। प्राचीन काल से आज तक के संगीत के सभी विद्वानों के समक्ष यह समस्या रही। भरत ने इसी समस्या का अनुभव किया था। पाश्चात्य विद्वानों ने भी इस पर काफी खोजबीन की है। प्रायः सभी पाश्चात्य विद्वान असमान दूरी के पक्ष में और भारतीय विद्वान समान दूरी के। भरत ने ‘सारणा चतुष्टयी’ नामक प्रयोग केवल इसी उद्देश्य से किया था।

व्यवहार की सरलता के लिए 22 श्रुतियों में से सात श्रुतियाँ चुन ली गई, जिन्हें शुद्ध स्वर कहा गया। इन सातों स्वर को क्रमशः षडज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद की.संज्ञा दी गई। उच्चारण की सुविधा के लिए इन्हें क्रमशः सा, रे,ग, म, प, ध, नि कहा गया। इस स्थिति में यह प्रश्न उठना. स्वभाविक है कि किस आधार पर 22श्रुतियों में से सात श्रुतियाँ चुन ली गई। इस उत्तर के लिये 13वी शताब्दी के ‘संगीत रत्नाकर’, जिसके लेखक शारंगदेव है, का निम्नलिखित दोहा बडा सार्थक सिद्ध होता है।                  

चतुश्चतुश्चतुश्चैव षडज मध्यम पंचमा ।                 

 द्वै द्वै निषाद गांधारौ तिस्त्री ऋषभ धैवतो।।           

अर्थात सा, म, प की 4-4 / ग और नि की 2-2 / रे और ध की क्रमशः 3-3 श्रुतियाँ मानी गई।

प्राचीन और आधुनिक स्वर स्थानों में अन्तर:-

  • दोनों कालों में समानता यह है कि एक सप्तक में 22 श्रुतियाँ मानी गई और सातों स्वर की श्रुतियाँ भी समान रखी गई।
  • प्राचीन और मध्यकाल दोनों में प्रत्येक स्वर की स्थापना निर्धारित श्रुतियों के अन्तिम श्रुति पर की गई। उदाहरण के लिये सा की चार श्रुतियाँ है इसलिये सा चौथी श्रुति पर माना गया, इस प्रकार रे 7वी पर क्योंकि रे की 3 श्रुतियाँ है, ग 9वी पर, म 13वी पर, प 17 वी पर, ध 20वी पर, और नि 22 वी श्रुति पर स्थित किया गया

प्राचीन श्रुति स्वर व्यवस्था

1 2 3 4 / 5 6 7 / 8 9 / 10 11 / 12 13 / 14 15 16 17 / 18 19 20 / 21 22 /

       सा /     रे  /   ग  /            म  /             प / ध /      नि

  • इस तालिका को देखने से यह स्पष्ट है कि ग अपने पिछले स्वर रे से और नि ध से केवल 2 श्रुति ऊचा है। इसलिये ग और नि कोमल हो जायेंगे। ग और नि के कोमल होने से प्राचीन अथवा मध्यकालीन शुद्ध सप्तक आधुनिक थाट के समान होगा।
  • जैसा कि हम पीछे बता चुके हैं कि आधुनिक, प्राचीन और मध्यकाल में स्वरों की श्रुति संख्या में कोई अन्तर न था, न है। अन्तर सिर्फ इस बात का हे की प्राचीन काल के विपरित, आधुनिक काल में प्रत्येक स्वर अपनी प्रथम श्रुति पर माना गया है। इसलिये पहली श्रुति पर सा पाँचवीं पर रे, आठवीं पर ग, दसवीं पर म, चौदहवीं पर प, अठारहवीं पर ध, और इक्कीसवी श्रुति पर नि स्थापित किया गया।

आधुनिक श्रुति स्वर व्यवस्था:-

1  2  3  4  5 /   6  7  8 /   9  10  / 11   12 

सा           रे  /        ग /      म /

13   14 /   15   16  17  18  / 19  20 21 / 22

      प   /                 ध   /           नि /

  • ऊपर की तालिका में केवल मध्यम स्वर गंधार से दो श्रुति ऊचा है, इसलिये म को थोड़ी देर के लिये कोमल कहा जा सकता है किंतु म कोमल होता ही नहीं। उसका निम्नतम रूप शुद्ध है। इसलिये मध्यम का कोमल होने का प्रश्न नहीं उठता। इसी कारण से कुछ पुराने गायक शुद्ध म को कोमल म भी कहते है। आधुनिक काल में प्रत्येक स्वर शुद्ध होने के कारण शुद्ध थाट बिलावल माना जाता है।

प्राचीन ग्रन्थकारों के शुद्ध तथा विकृत स्वर

  • प्राचीन काल से आजतक एक सप्तक के अन्तर्गत 22 श्रुतियाँ मानी जाती रही है। इनके नाम है – छन्दोवती, दयावती, रजनी, रक्तिका,रोद्री, क्रोधा, वज्ज्रिका, प्रसारिणी, प्रिति, मार्जनी, क्षिति, रक्ता, सन्दिपनी, अलापिनी, मदन्ती, रोहिणी, रम्या, उग्रा,क्षोभिणी, तीव्रा, कुमुद्वती और मन्दा। इन्हीं 22 श्रुतियों पर विभिन्न विद्वानों ने शुद्ध तथा विकृत स्वरों को अपने अपने ढंग से स्थापित किया। विद्वानों में भरत, शारंगदेव, अहोबल, लोचन, पुन्डरीक बिट्ठल, रामामात्य, सोमनाथ आदि है। इन सबका मत एक सप्तक के अन्तर्गत श्रुतियों और शुद्ध स्वरों की संख्या और स्वरों की स्थापना में एक है। प्रत्येक ने शुद्ध स्वर को निर्धारित श्रुतियों में से उनकी अंतिम श्रुति पर स्थापित किया है।

भरत के स्वर –  भरत ने सात शुद्ध स्वरों के साथ साथ दो विकृत स्वर माने है – अन्तर गंधार और काकली निषाद। सातों शुद्ध स्वरों को क्रमशः चौथी, सातवीं, नौवीं, तेरहवी, सतरहवीं, बीसवीं और बाइसवीं श्रुति पर स्थापित किया है। अन्तर गंधार ग्यारहवीं पर और काकली निषाद दूसरी श्रुति पर स्थापित किया है। इन्हें भरत ने स्वर साधारण कहा है।

शारंगदेव के शुद्ध और विकृत स्वर- शारंगदेव के समय में विकृत स्वरों की वृद्धि हुई। शारंगदेव ने पहले पहल भरत के अन्तर गंधार और काकली निषाद के अतिरिक्त अनेक विकृत स्वरों की भी कल्पना की जिनकी कुल संख्या 12 थी। इस प्रकार उसने कुल 7 शुद्ध और 12 विकृत, कुल 19 स्वर माना।

  • 1ली श्रुति पर कौशिक नि,2री पर काकली नि, 3री पर च्युत षडज, 4थी पे षडज, 5वी पर कौशिक षडज, 6वीं पर अन्तर षडज, 7वी पर शुद्ध ऋषभ, 8 वी पर विकृत ऋषभ, 9वीं पर शुद्ध ग, 10 वीं पर साधारण ग, 11वी पर अन्तर ग, 13वीं पर म, 14वीं पर कौशिक मध्यम, 15वी पर विकृत मध्यम, 16वी पर मध्यम ग्राम पंचम, 17 वी पर प ,18 वीं पर मध्यम ग्राम धैवत, 20 वीं पर शुद्ध ध और 22वीं पर शुद्ध नि स्थापित किया।

लोचन के शुद्ध और विकृत स्वर:-

  • लोचन ने ‘राग तरंगिणी’ नामक पुस्तक में शुद्ध तथा विकृत स्वरों की स्थापना की। उन्होंने भी अन्य विद्वानों के समान सातों स्वर की श्रुतियाँ क्रमशः 4-3-2-4-4-3-2 माना है तथा प्रत्येक स्वर अपनी अन्तिम श्रुति पर स्थापित किया। इसलिये षडज चौथी श्रुति पर स्थापित हुआ।
  • प्रथम पर तीव्र निषाद, 2री पर काकली निषाद, 3री पर तीव्रतम निषाद, 4थी पर षडज, 6ठी परकोमल ऋषभ, 7वीं पर शुद्ध ऋषभ, 9वीं पर शुद्ध गंधार, 10वीं पर तीव्र गंधार, 11वीं पर तीव्रतर गंधार, 12वीं पर तीव्रतम गंधार, 13वी पर शुद्ध मध्यम, 14वी पर तीव्र मध्यम, 15वीं पर तीव्रतर मध्यम, 17वीं पर पंचम, 20वीं.पर धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद स्थापित किया। इन स्वरों को देखने से ऐसा लगता है कि उनके समय में गंधार और निषाद को बहुत महत्व दिया जाता था। और यह परम्परा भरत के समय में मालूम पडती है।

राममात्य के स्वर:-

  • इन्होंने सन्1550 के लगभग ‘ स्वरमेलकलानिधी’ नामक पुस्तक में शुद्ध तथा विकृत स्वरों को विभिन्न श्रुतियों पर इस प्रकार स्थापित किया है कि 1ली पर कौशिक निषाद, 2री पर काकली निषाद, 3री पर च्युत षडज निषाद, 4थी पर षडज, 7वी पर शुद्ध ऋषभ, 9वीं पर गंधार, 10वीं पर साधारण गंधार, 11वीं पर अन्तर गंधार, 12 वीं पर च्युत मध्यम गंधार, 13वीं पर मध्यम,16वीं पर च्युत पंचम, 17वीं पर पंचम, 20वीं पर धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद स्वर स्थापित किया।
  • इनके शुद्ध स्वर तो अन्य ग्रन्थकारों के समान है परंतु विकृत स्वरों में कुछ अन्तर है। चार विभिन्न श्रुतियों को गंधार और निषाद की संज्ञा और तीन विभिन्न श्रुतियों को क्रमशः ऋषभ और धैवत की संज्ञा दी है। इस प्रकार कुल मिलाकर 14 स्वर माने है और गंधार निषाद के दो – दो नाम रखे है।

पुन्डरीक बिट्ठल के शुद्ध और विकृत स्वर:- पुन्डरीक बिट्ठल ने रागमाला ग्रंथ में 22श्रुतियों पर अपने स्वरों की स्थापना इस प्रकार की है- 1ली श्रुति पर एकगतिक निषाद, 2री पर द्विगतिक निषाद, 3री पर तृगतिक निषाद, 4थी पर षडज, 7वीं पर ऋषभ, 8 वीं पर 1गतिक ऋषभ, 9वीं पर गंधार या द्विगतिक ऋषभ, 10 वीं पर एकगतिक गंधार, 11वीं पर द्विगतिक गंधार, 12वीं पर तृगतिक गंधार,  13वीं मध्यम, 14वीं पर एकगतिक म, 15वीं पर द्विगतिक म, 16 वीं तृगतिक म, 17वीं पर पंचम, 20वीं पर धैवत, 21वीं पर निषाद स्वरों की स्थापना की। इस प्रकार उन्होंने विकृत स्वरों को एक नवीन नाम दे दिया जिसे गतिक कहा।

  • शुद्ध स्वरों को अन्य ग्रन्थकारों के समान ही माना है।

सोमनाथ के स्वर:-

  • राग विवोध नामक ग्रन्थ में सोमनाथ ने अपने स्वरों के स्थान विभिन्न श्रुतियों पर निश्चित किया है। 1ली श्रुति पर कौशिक नि, 2री पर काकली नि, 3री पर मृदु षडज, 4थी पर षडज, 7वीं पर ऋषभ, 8वीं पर तीव्र ऋषभ, 9वीं पर गंधार, 10वीं पर साधारण गंधार, 11वीं पर अन्तर गंधार, 12वी पर मृदु मध्यम, 13वीं पर मध्यम, 14वीं पर मृदु पंचम, 17वीं पर पंचम, 20 वी पर धैवत, 21 वीं पर तीव्र धैवत और 22वीं श्रुति पर निषाद की स्थापना की।
  • इनके स्वरों को देखने से यह स्पष्ट है कि उन्होंने तीध विभिन्न श्रुतियों पर गंधार और निषाद स्वरों को क्रमशः स्थापित किया है। ऋषभ और धैवत के कुल दो रूप माने है और चार विभिन्न श्रुतियों पर मध्यम माना है। इससें यह स्पष्ट है कि उनके समय में गंधार, मध्यम, और निषाद स्वरों को अधिक महत्व दिया जाता था। सा, म, और प के भी विकृत रूप स्वीकार किये गए हैं जिन्हें उन्होंने मृदु नाम दिया। यह उनका नवीन नाम था।

व्यंकटमुखी के स्वर:-

  • दक्षिण भारत के पंडित व्यंकटमुखी ने 17वीं शताब्दी में चतुर्दण्डिप्रकाशिखा नामक एक ग्रन्थ लिखा जिसमें उन्होंने अपने स्वरों का वर्णन किया है। उन्होंने 7 शुद्ध और 5 विकृत स्वर माने है, जिनके नाम है साधारण गंधार, अंतर गंधार, वराली गंधार, कौशिक और काकली निषाद। उन्होंने शुद्ध गंधार और.साधारण गंधार के तथा शुद्ध और कौशिकी निषाद के दो-दो नाम रखें।
  • शुद्ध गंधार को पंचश्रुति ऋषभ, साधारण गंधार को षटश्रुति ऋषभ, शुद्ध निषाद को पंचश्रुति धैवत और कौशिकी निषाद को षटश्रुति धैवत भी कहा है। इन्हीं स्वरों से उन्होंने 72 मेलों की उत्पत्ति बताई है। कुछ विद्वानों का मत है कि व्यंकटमुखी  से 300 वर्ष पहले ही 72 थाटों का आविष्कार हो चुका है।

अहोबल के स्वर:-

  • ‘संगीत पारिजात’ स्वर की दृष्टि से बडा महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह ग्रंथ 1650 में लिखा गया, जिसमें बाइसो श्रुति पर कोई न कोई स्वर स्थापित करके एक नई विचारधारा का श्री-गणेश हुआ। 7 श्रुतियों के दो – दो नाम दिये है। 7शुद्ध, 8 कोमल और 14 तीव्र, कुल मिलाकर 29 स्वर माने है, किन्तु श्रुतियाँ 22 ही मानी है।
  • वीणा पर स्वरों की स्थापना करते समय 12.स्वरों को ही मुख्य माना है। अति विकृत स्वरों की चर्चा गौण रूप से की है।
  • शुद्ध स्वरों के स्थान अन्य विद्वानों से अलग नहीं है। प्रथम श्रुति पर तीव्र निषाद, 2री श्रुति पर तीव्रतर निषाद, 3री पर तीव्रतम निषाद, 4थी पर षडज, 5वी पर पूर्व ऋषभ, 6वीं पर कोमल ऋषभ, 7वीं पर शुद्ध ऋषभ, 8वीं पर तीव्र ऋषभ या कोमल गंधार, 9वीं पर तीव्रतर ऋषभ या शुद्ध गंधार, 10 वीं पर तीव्र गंधार, 11वी श्रुति पर तीव्रतर गंधार, 12 वीं पर तीव्रतम गंधार, 13वीं पर शुद्ध मध्यम, 14वीं पर तीव्र मध्यम, 15वीं पर तीव्रतम मध्यम, 16वीं पर तीव्रतम मध्यम, 17वीं पर पंचम, 18वीं पर पूर्व धैवत, 19वीं पर कोमल धैवत, 20वीं पर शुद्ध धैवत, 21 वीं पर कोमल निषाद तथा 22वीं श्रुति पर शुद्ध निषाद स्थापित किया।
  • संगीत पारिजात की मुख्य विशेषता यह है कि एक तरफ उन्होंने पुरानी परम्परा को मानते हुए 22श्रुतियों पर स्वरों की स्थापना की है और दूसरी ओर वीणा के तार पर 7 शुद्ध और 5 विकृत स्वर स्थापित करके आधुनिक स्वरों का स्थान खोला है। संगीत के इतिहास में सर्वप्रथम उन्होंने ही वीणा के तार पर स्वरों का स्थान निश्चित किया।
  • अहोबल के समय तक किन्हीं भी दो स्वरों की दूरी श्रुति द्वारा आंकी जाती थी, किन्तु अहोबल के समय से एक नये अध्याय का सूत्रपात हुआ और तार की लम्बाई द्वारा स्वरों की दूरी निश्चित की जाने लगी।
  • हम सभी जानते है कि वर्तमान काल के वैज्ञानिक युग में तार की लम्बाई और फलस्वरूप आंदोलन संख्या का कितना महत्व है।

आधुनिक स्वर व्यवस्था:-

  • इस काल के ग्रन्थों में भातखंडे द्वारा कृत ‘अभिनव राग मंजरी’ और ‘लक्ष्य संगीत’ प्रमुख हैं। इनमें बिलावल थाट को शुद्ध माना गया है। बिलावल को शुद्ध थाट मानने की परम्परा मध्य काल में अहोबल के समय से प्राप्त होती हैं। बाद में महाराजा प्रतापसिंह देव और मुहम्मद रजा ने भी बिलावल थाट को ही शुद्ध माना।
  • दक्षिण संगीत पद्धति में कनकांगी को शुद्ध थाट माना जाता हैं। इसमें दो अर्धस्वर एक – दूसरे के बाद आते है जैसे – रे रे और ध ध। इन अर्धस्वर का लगातार उच्चारण साधारण व्यक्ति के लिए कठिन है। आलाप में तो इन्हें किसी प्रकार प्रयोग किया जा सकता है, तान में तो सर्वथा मुश्किल है। दूसरे ये दोनों अर्धस्वर बराबर नहीं हो सकते। तीसरे दो अर्धस्वर का एक साथ उच्चारण कानों को प्रिय नहीं लगेगा। इस कठिनाई को दूर करने के लिये दक्षिणी पद्धति में आरोह में एक अर्धस्वर प्रयोग करते है और अवरोह में दूसरा। फलस्वरूप शुद्ध थाट कनकांगी को जो हमारे भैरव के समान है, शुद्ध मेल मानने लगे है। वहाँ संगीत शिक्षा इसी से प्रारंभ की जाती हैं। संत गायक पुरन्दरदास ने दक्षिण संगीत में यह संशोधन किया है। मालवगौढ को शुद्ध थाट मानते हुये भी शंकराभरण राग सबसे लोकप्रिय है। इससें ऐसा प्रतीत होता है भविष्य में वहाँ भी मालवगौढ के स्थान पर शंकराभरण को शुद्ध मानने लगेंगे। शंकराभरण राग बिलावल के समान है।
  • अभिनव राग मंजरी में स्व० विष्णु नारायण भातखंडे ने अहोबल और श्रीनिवास के स्वरों के आधार पर उत्तर भारतीय 12 स्वरों की स्थापना की।

भातखंडे जी के स्वरों की लम्बाई:-

  • भातखंडे जी ने सा की 36, रे की 34, रे की 32, ग की 27, म की 30, ग की 28*2/3, म की 27, म(t)  की 25*1/2, प की 24, ध की 22*2/3, ध की 21*1/2, नि की 20, नि की 19*1/9 तथा तार सा की 18 दूरी घूड़च से माना है। इन स्वरों का पारस्परिक गुणांतर 1, 18/17, 9/8, 6/5, 5/4, 54/43, 4/3, 24/17, 3/2, 37/27, 9/5, 81/43, और 2 निर्धारित. है।
  • ग और नि का गुणांतर 54/43 की बजाये 5/8 और सा और नि का गुणांतर 81/43 के बजाये 15/8 होनी चाहिए। अतः नि की आन्दोलन संख्या 240*15/8=450 होनी चाहिये। इस दृष्टि से ग की आंदोलन संख्या 300 होनी चाहिये। यहाँ पर स्मरण करा देना आवश्यक है कि तानपुरे से प्राप्त ग और नि सहायक नादों की आन्दोलन संख्या क्रमशः300और 450 ही.है। अतः इन्हें ही मान्यता देना उचित होगा, पर हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति ‘मराठी’ में भातखंडे जी ने.सच्चे गंधार 5/4 और निषाद 15/8 को मान लिया।

श्रुति स्वर विभाजन का इतिहास

  • श्रुतियों को स्वरों में विभाजन की दृष्टि से संगीत के इतिहास को तीन भागों में विभाजित कर सकते है, प्राचीन काल, मध्य काल, आधुनिक काल। प्राचीन काल का समय अनादि काल से 13वीं शताब्दी तक, मध्य काल 14वी शताब्दी से 18 वी शताब्दी तक तथा आधुनिक काल 19 वी शताब्दी से आज तक माना जाता है।

प्राचीन काल:-  प्राचीन काल में श्रुति स्वर की दृष्टि से दो ग्रन्थ हमारे सामने आते है पहला भरत का नाट्यशास्त्र और दूसरा शारंगदेव का संगीत रत्नाकर। नाटयशास्त्र नाट्य से संबंधित ग्रंथ है जैसा कि नाम से स्पष्ट है, किन्तु इसके अन्तिम 6 अध्यायों में संगीत शास्त्र पर प्रकाश डाला गया है। यह ग्रंथ आज भी उत्तरी और दक्षिणी भारतीय संगीत का आधार ग्रंथ माना जाता है।

श्रुति की दृष्टि से भरत और शारंगदेव में समता

  1. भरत और शारंगदेव दोनों ने एक सप्तक के अन्तर्गत 22 श्रुतियाँ मानी।
  2. दोनों विद्वानों ने प्रत्येक स्वर की स्थापना उसकी अंतिम श्रुति पर की है।
  3. विद्वानों ने श्रुतियों को समान माना है अर्थात किन्हीं भी दो निकटवर्ती श्रुतियों के बीच समान अन्तर माना है। जो ऊचाई दूसरी और तीसरी श्रुतियों के बीच है वहीं ऊचाई तीसरी और चौथी श्रुतियों के बीच है। इसी प्रकार का समान अन्तर 22 वीं श्रुति तक है। भरत की श्रुतियों के विषय में दो मत है – एक मतानुसार श्रुतियाँ समान अन्तर पर, दूसरे मतानुसार श्रुतियाँ असमान अन्तर पर फैली हुई है, किन्तु शारंगदेव की श्रुतियों के विषय में कोई दूसरा मत नहीं हैं। उसकी श्रुतियाँ बराबर दूरी पर है।

मध्य काल

  • 14वीं से 18वीं शताब्दी का समय मध्यकाल के अन्तर्गत आता है। इस काल में संगीत संबंधी अनेक पुस्तकें लिखी गई किन्तु श्रुति की दृष्टि से भिन्न पाँच पुस्तकें महत्व की है—
    • लोचन कवि कृत ‘राग तरंगिणी’—विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि इसकी रचना 15वीं शताब्दी के प्रारंभ से हुई जो यवन कालीन शास्त्र की प्रथम पुस्तक है। इसमें 12वीं शताब्दी के जयदेव और 14वीं शताब्दी के विद्यापति का उल्लेख मिलता है। उसका शुद्ध थाट आधुनिक काफी के समान था। इसी पुस्तक से राग रागिनी अथवा मूर्छना राग वर्गीकरण के स्थान पर मेल – राग वर्गीकरण का सिद्धांत प्रारंभ होता हुआ मालूम पडता है।
    • पं० अहोबल कृत ‘संगीत पारिजात’—पं० अहोबल संगीत के प्रकाण्ड पंडित थे। उन्होंने संगीत पारिजात की रचना सन्1650 में की। इसमें उन्होंने 29 स्वरों का नाम तो लिया है किन्तु 12 स्वरों को ही प्रयोग किया है। इसी में उन्होंने 7शुद्ध और 5 विकृत स्वरों की स्थापना वीणा के तार पर पहले पहल की, किंतु उनका वर्णन स्पष्ट नहीं। पं० अहोबल का शुद्ध थाट लोचन कवि के समान आधुनिक काफी के समान था।
    • ह्दय नारायण देव कृत ‘ह्रदय कौतुक’ और ह्रदय प्रकाश—इन दो पुस्तक की रचना लगभग संगीत पारिजात के समय हुई। ह्रदय नारायण ने भी ह्रदय प्रकाश पुस्तक में पं० अहोबल के समान ही 12 स्वरों की स्थापना वीणा के तार पर की।
    • श्रीनिवास कृत ‘राग तत्व विवोध’–  इस ग्रन्थ की रचना 17वी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुई। इसमें लेखक ने अहोबल के अनुसार वीणा पर 12 स्वरों की स्थापना की। यद्यपि दोनों पंडित ने वीणा पर 12 स्वरों की स्थापना की है केवल श्रीनिवास ने ही इसे ठीक से समझाया है। अतः उनके श्रुति- स्वर विभाजन का नींचे वर्णन दिया जा रहा है।

       वीणा के तार पर श्रीनिवास के स्वर

  • 17वी शताब्दी में श्रीनिवास नें अहोबल के समान 7 शुद्ध और 5 विकृत स्वरों की स्थापना की है। उसने मेरू और घुडच के बीच तार की लम्बाई 36” रखी।
  • वीणा के ऊपरी भाग को, जिसके अंदर से तार खुंटी के अन्दर जाता है, मेरु और वीणा के नीचें भाग में छोटी चोकी के आकार की वस्तु को, जिसके ऊपर से तार नीचें को जाता है, ब्रिज अथवा घुडच कहते है। श्रीनिवास ने यह बताया कि वीणा के खुले तार से षडज स्वर निकलता है।
  • तार सा की स्थापना—वीणा के खुले हुए तार को दो बराबर भागों में विभाजित किया और बिल्कुल बीच पर तार सा की स्थापना की। इस प्रकार  तार सा घुडच से 18 इंच की दूरी पर स्थित हुआ।
  • पंचम की स्थापना- मेरु और तार सा के बीच के तार को जिसकी लम्बाई 18” है तीन बराबर भागों में बाटाँ और मेरु से दूसरे भाग के अन्त में पंचम स्वर स्थित किया। इस प्रकार पंचम स्वर घुडच से 18/3=6+18=24” दूरी पर स्थित हुआ।
  • मध्यम की स्थापना- मेरु और तार सा के बीच के भाग को जो 18 इंच लम्बा है, दो बराबर भागों में विभाजित किया और बिल्कुल बीच में मध्यम स्वर की स्थापना की। इसलिये मध्यम घुडच से 18+18/2=27” की दूरी पर हुआ।
  • पंचम की स्थापना- मेरु और पंचम के 12” के खुले तार को दो बराबर भागों में बाँटा और बिल्कुल बीच में गंधार स्वर स्थापित किया। इसलिये गंधार घुडच से 24+6=30” बराबर दूरी पर हुआ।
  • ऋषभ की स्थापना- पीछे हम बता चुके हैं कि मेरु और पंचम में 12 इंच का अन्तर है इस भाग को तीन बराबर भागों में विभक्त किया और पहले भाग के अन्त में ऋषभ की स्थापना की। इसलिये रे मेरु से 4 इंच की दूरी पर हुआ। दूसरे शब्दो में घुडच से 36 – 4 =32 इंच की दूरी पर हुआ।
  • धैवत की स्थापना- इसकी स्थापना स्पष्ट नहीं है कारण यह है कि श्रीनिवास ने धैवत की स्थापना पंचम और तार सा के मध्य किया है। मध्य के दो अर्थ हो सकते है, पहला तार के बीचोंबीच, दूसरा पंचम व तार सा के बीच किसी भी स्थान पर। यहाँ पर पहला अर्थ ठीक नहीं बैठता क्योंकि उसके अनुसार प और सा के बीच का भाग 6इंच लम्बा है। इसलिये धैवत 3+18=24 इंच की दूरी पर होगा। इस धैवत और ऋषभ में षडज-पंचम भाव नहीं स्थापित होगा जो बहुत आवश्यक है। अतः हम इस धैवत को छोड़ देंगे और मध्य का दूसरा अर्थ लेते हुए धैवत की स्थापना षडज-पंचम भाव से करेंगे। इस क्रिया के पक्ष में दूसरा मुख्य प्रमाण यह है कि श्रीनिवास ने इस बात पर बहुत बल दिया की संपूर्ण सप्तक में षडज-पंचम भाव है। इसलिये धैवत की लम्बाई निकालने के लिए ऋषभ की लम्बाई 3/2 में भाग देंगे। 32+3/2=32*2/3=64/3। अतः धैवत घुडच से 21*1/3 की दूरी पर हुआ।
  • नि की स्थापना – प और सा के बीच का भाग 6 इंच लम्बा है, इसे तीन भागों में बाटाँ और दूसरे भाग के अन्त में निषाद स्थित किया। इसलिये नि घुडच से 18+2=20 इंच की दूरी पर हुआ।
  • कोमल रे की स्थापना- सा और रे के बीच के भाग को, जिसकी लम्बाई 4इंच है, तीन भागों में विभक्त किया। सा से दूसरे भाग के अंत में कोमल रे स्थित किया। अतः श्रीनिवास के मेरु और कोमल रे में 4/3+4/3=8/3 इंच का अन्तर होगा, क्योंकि प्रत्येक भाग बराबर लम्बा है। इसलिये रे घुडच से 32+4/3=33*1/3” की दूरी पर होगा।
  • कोमल ध की स्थापना-  जिस प्रकार शुद्ध रे की सहायता से शुद्ध ध स्थापित किया उसी प्रकार श्रीनिवास ने कोमल रे की सहायता से कोमल ध स्थापित किया। कोमल ध की लम्बाई कोमल ऋषभ से कम है, इसलिये रे की लम्बाई में 3/2 से भाग देंगे। 33 1/3+3/2= 200/9, अतः कोमल ध घुडच से 22 2/9” की दूरी पर हुआ।
  • तीव्र ग की स्थापना –  यहाँ पर यह जान लेना आवश्यक है कि मध्य काल और आधुनिक काल के ग और नि में अन्तर है, उस समय का शुद्ध ग और नि आज कोमल ग और नि है और उस समय का तीव्र ग और ध आज का शुद्ध ग और नि है। तीव्र ग को श्रीनिवास ने सा और ध के बिल्कुल बीच स्थापित किया। ध 21 1/3” की दूरी पर है, इसलिये मेरु और ध के.बीच की दूरी का.भाग 36 – 21 1/3 = 14 2/3 इंच लम्बा हुआ, इसको दो भागों में बाटाँ गया और प्रथम भाग के अन्त में तीव्र ग का स्थान माना, इसलिये तीव्र ग मेरु से  44/3×1/2=44/6 या 7 2/6” की दूरी पर हुआ और घुडच 18 2/3 की दूरी पर हुआ।
  • तीव्र नि की स्थापना – इसकी स्थापना धैवत और तार सा की दूरी को तीन भागों में से दूसरे भाग पर की गई। घुडच से धैवत 21 1/3 की दूरी पर है और तार सा 18 इंच की। इसलिये ध और सा के बीच का भाग 3 1/3” लम्बा होगा। इस लम्बाई को तीन बराबर भागों में बाँटा गया, अतः प्रत्येक हिस्सा 10/9 इंच लम्बा हुआ। इसलिये तीव्र नि घुडच 18+10/9= 19 1/9 इंच की दूरी पर होगा।
  • तीव्रतर म की स्थापना- इसे तीव्र ग और सां को तीन बराबर भागों में  से प्रथम भाग पर माना गया, तीव्र ग 28 2/3 की दूरी पर और सा 18” की दूरी पर है। इसलिये ग और सा के बीच का भाग 28 2/3 – 18 = 10 2/3 “ लम्बा होगा, इसको तीन बराबर भागों में बाटँने से प्रत्येक भाग 32/9” का हुआ। अतः तीव्र म घुडच से 25 1/9” की दूरी पर होगा।

आधुनिक स्वरों की स्थापना:-

  • आधुनिक काल 19 वी शताब्दी से प्रारंभ. होता. है। इस समय के मुख्य ग्रंथों में पं० विष्णु नारायण भातखंडे द्वारा कृत ‘अभिनव राग मंजरी’ और ‘लक्ष्य संगीत’ है। इन ग्रन्थों में एक नवीन बात यह मिलती हैं कि भातखंडे जी ने काफी के स्थान पर बिलावल थाट को शुद्ध माना। इसका कारण यह है कि काफी को शुद्ध थाट माने जाने के बाद बिलावल धीरे धीरे प्रचार में आने लगा।
  • मध्यकाल के शब्दो में बिलावल में तीव्र ग-नि स्वर लगते है इसलिये इस समय भी कुछ पुराने गायक ऐसे मिलते है जो यह कहा करते थे कि  बिलावल में तीव्र स्वरों का प्रयोग होता है। इसी सिद्धांत को मजबूत करने के लिए भातखंडे जी ने चतुश्चतुश्चतुश्चैव का सिद्धांत मानते हुए प्रत्येक स्वर को श्रीनिवास के ठीक विपरीत, सभी स्वरों को प्रथम श्रुति पर रखा। तीन और चार श्रुतियों को अन्तर वाले स्वरों को शुद्ध स्वर माना और दो श्रुतियों को कोमल। इस प्रकार प्रथम श्रुति पर सा, पाँचवीं पर रे, 8वी पर ग, 10वी पर म, 14वी पर प, 18वी पर ध, और 21 वी पर नि स्थापित हुआ। केवल मध्यम अपने पिछले स्वर ग से दो श्रुति ऊचा है, इसलिये म को कोमल.होना चाहिये, किन्तु म कोमल नहीं होता। वास्तव में आजकल कोमल म के स्थान पर ही शुद्ध म माना गया है।
  • भातखंडे जी ने वीणा के तार पर 12 स्वरों की स्थापना की। साथ ही साथ प्रत्येक स्वर की आंदोलन संख्या निकाली।

   तार की आन्दोलन संख्या और नाद

  • तानपुरा, सितार अथवा वीणा के तार को छेडऩे से ध्वनि उत्पन्न होती है। इस प्रकार की ध्वनि से सभी परिचित है। ध्वनि के उत्पन्न होने का कारण तार का कम्पन है।
  • तार को छेडऩे से वह अपने निश्चित स्थान से एक बार थोड़ा ऊपर जाता हैं फिर उसी स्थान पर लौट आता है। इसके बाद फिर उतनी दूरी तक नीचें जाता हैं और फिर पुनः अपने स्थान पर लौट आता है। ऊपर नीचें जाने का यह क्रम जब तक बना रहता है जब तक छेडऩे का प्रभाव बना रहता है । तार के इसी कम्पन को संगीत में आन्दोलन कहते है। एक सेकेंड में तार जितनी बार आन्दोलन करता है, उस स्वर की उतनी आंदोलन संख्या मानी जाती है।

  तार के आन्दोलन की चौडाई और नाद का छोटाबडापन

  • तार के आन्दोलन की चौडाई छेडने के प्रारंभ में सबसे अधिक होती हैं। जब आन्दोलन की चौडाई अधिक होती हैं तो नाद बडा होता है और जब कम होता है तो नाद छोटा होता है। नाद के बडे होने से यह लाभ होता है कि उत्पन्न ध्वनि अधिक दूर तक सुनाई पडती है। जैसे-जैसे छेडऩे का प्रभाव कम होता जाता है, तो आन्दोलन की चौडाई कम होती जाती है और नाद छोटा होता जाता है। नाद धीरे धीरे शुन्य हो जाता है और ध्वनि भी कम सुनाई पडती है।

आन्दोलन संख्या और नाद की ऊंचाई और निचाई

  • जैसे-जैसे एक सेकंड में आंदोलन की संख्या बढती है नाद की ऊचाई भी बढती जाती है। अगर सा की आंदोलन संख्या 240 है और किसी दूसरे स्वर की 270 तो यह स्वर सा से ऊचा होगा। इसी प्रकार 200 संख्या वाला स्वर सा से नीचा होगा। अतः यह स्पष्ट है कि एक सेकेंड में होने वाले आंदोलन पर स्वर अथवा नाद की ऊचाई निचाई निर्भर करती है।

   आन्दोलन संख्या और तार की लम्बाई

  • इन दोनों में विपरीत संबंध है जैसे-जैसे आंदोलन संख्या बढती है तार की लम्बाई कम होती जाती है और जैसे-जैसे आन्दोलन संख्या कम होती है तार की लम्बाई बढ जाती है। उदाहरण के लिए म के तार की लम्बाई अधिक और प के तार की लम्बाई कम होगी, क्योंकि म की आन्दोलन संख्या 320 और प की 360 है।

गुणांतर

  • गणित में एक जाति की दो वस्तुओं के पारस्परिक संबंध को अनुपात कहा गया है और संगीत में दो स्वरों के पारस्परिक संबंध को गुणांतर कहा जाता है। जैसे सा प में 3/2 का गुणांतर है। सा की 240 और प की 360 आन्दोलन संख्या. है। इसलिये दोनों का गुणांतर निकालने के लिए 360 में 240 से.भाग देंगे और जो कुछ फल आयेगा वह दोनों का गुणांतर होगा 360÷240=3/2।
  • किन्हीं दो स्वरों का गुणांतर समान होगा चाहे आन्दोलन संख्या के आधार पर निकाला जाये या तार की लम्बाई पर।

     गुणांतर द्वारा स्वर की प्राप्ति

  • किसी स्वर की आन्दोलन संख्या मालूम हो तो गुणांतर द्वारा दूसरे स्वर की आन्दोलन संख्या निकाली जा सकती है।
  • दिये गये आंदोलन संख्या में गुणांतर से गुणा करने से दूसरे स्वरों की आन्दोलन संख्या प्राप्त होगी। जैसे 240×4/3=80×4=320, अतः देसरे स्वर की आन्दोलन संख्या 320 होगी।

तार की लम्बाई द्वारा आंदोलन संख्या निकालना

  • अगर किन्हीं दो स्वरों की लम्बाई दी गई हो तो दोनों का गुणांतर निकाल लेंगे। अगर केवल एक ही स्वर की लम्बाई दी हो तो षडज से उसका गुणांतर निकाल लेंगे और दिये हुए आन्दोलन संख्या में या सा की आन्दोलन संख्या में  जैसी आवश्यकता हो, उस गुणांतर में गुणा कर देंगे। सा की आन्दोलन संख्या 240 और उसके तार की लम्बाई 36 इंच निश्चित है।

गुणांतर द्वारा तार की लम्बाई निकालना

  • हम पीछे बता चुके है कि तार की लम्बाई और आंदोलन संख्या में उलटा संबंध है। जैसे-जैसे तार की लम्बाई बढती जाती है उसकी आंदोलन संख्या प्रति सेकंड घटती जाती है। इसलिये किसी स्वर की तार की लम्बाई निकालने के लिए सा की लम्बाई से प्राप्त गुणांतर से भाग देंगे जैसे -3/2 गुणांतर वाले स्वर की लम्बाई निकालने के लिए 36 इंच में जो मध्य सा की लम्बाई है, 3/2 से भाग देंगे, 36÷3/2= 24 इंच। इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस स्वर का गुणांतर 3/2 है, उस स्वर के तार की लम्बाई 24 इंच होगी।

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