Sarang Dev

Sarang Dev Ka Jivan Parichay in Hindi Jivani Tansen Guru

Sarang Dev Ka Jivan Parichay in Hindi is described in this post . Kathak shastra notes available on saraswati sangeet sadhana

Sarang Dev Biography in Hindi

Sarang Dev Ka Jivan Parichay

    

शार्ङ्गदेव


• उत्तर भारतीय संगीत का प्रत्येक विद्यार्थी शार्ङ्गदेव से कहीं अधिक उसके ग्रन्थ ‘संगीत रत्नाकर’ से परिचित है। इसका कारण यह है कि यह ग्रन्थ भारतीय संगीत की आधारशिला है। शास्त्र में पग-पग पर इसी ग्रन्थ का सन्दर्भ आता है।
• इस ग्रन्थ की रचना आज से लगभग 7 सौ वर्ष पूर्व (तेरहवीं शताब्दी में हुई थी उस समय सम्पूर्ण भारत में संगीत की एक पद्धति थी और संगीत में उत्तर भारतीय संगीत और दक्षिण भारतीय संगीत इस प्रकार का कोई विभाजन न था इसलिये इसे दोनों संगीत पद्धतियों में आधार ग्रन्थ माना गया है। हम सभी जानते हैं कि यह ग्रन्थ संस्कृत की सूत्र – शैली में लिखा गया है। अतः आज का प्रत्येक व्यक्ति द्वारा इसको ठीक से समझ नहीं सकता।
• शार्ङ्गदेव का वास्तविक जन्म समय निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता, किन्तु इतना निश्चित रूप से अवश्य कहा जा सकता है कि उनका जन्म तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुआ।
• कुछ इतिहास वेत्ताओं ने उनका जन्म तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में सन् 1210 के बाद बताया है। उनके पूर्वज कश्मीर के निवासी थे, जो कुछ कारणवश दक्षिण भारत चले गये थे।
• शार्ङ्गदेव के पिता पं० शोडल देवगिरि के तत्कालीन राजा के यहाँ कार्य करते थे। शार्ङ्गदेव की प्राकृतिक प्रतिभा बाल्यपन से ही झलकती थी, अतः उन्हें सरलता से राजाश्रय और समुचित शिक्षा-दीक्षा मिली। शुरू से ही संगीत व साहित्य में उनका झुकाव था।
• तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पं० शारंगदेव ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ की रचना की। इसमें पूर्ववर्ती लगभग सभी ग्रन्थों का सार मौलिक ढंग से संकलित किया गया है। इसलिये किसी भी पारिभाषिक शब्द की व्याख्या करते समय अगर किसी प्राचीन पुस्तक के सन्दर्भ देने की आवश्यकता होती है, तो ‘संगीत रत्नाकर’ के श्लोकों का उल्लेख किया जाता है। कई विद्वानों ने इसकी टीका भी लिखी है।
• यह पुस्तक मुख्य 7 अध्यायों में विभाजित है, जैसे स्वराध्याय, राग विवेकाध्याय, प्रकीर्णकाध्याय, प्रबंधाध्याय, तालाध्याय, वाद्याध्याय और नृत्याध्याय ।
• इसमें समस्त गेय रचनाओं को, जिन्हें उस समय जाति कहते थे, दस वर्गों में विभाजित किया गया है- भाषा, विभाषा, अन्तर्भाषा, ग्राम राग, राग, उपराग, रागांग, भाषांग, उपांग और क्रियांग जो ‘रत्नाकर के दस विधि राग वर्गीकरण’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके साथ-साथ इसमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक राग – विभाजन भी माना गया है।
• आधुनिक काल के समान इसमें एक सप्तक के अन्तर्गत 22 श्रुतियाँ और 12 स्वर- 7 शुद्ध और 5 विकृत माने गये हैं। क्रमश: 4, 3, 2, 4, 4, 3 और 2 श्रुतियाँ शुद्ध स्वरों की मानी गई हैं। दोनों में मुख्य अन्तर यह है कि प्राचीन काल में प्रत्येक स्वर अपनी अन्तिम श्रुति पर स्थापित किया गया था और आधुनिक काल में प्रथम श्रुति पर माना जाता है, अतः उस समय शुद्ध थाट काफी माना जाता था और आजकल बिलावल, इसलिये ‘रत्नाकर’ में वर्णित राग हमारे प्रयोग में नहीं आ सके। दूसरे ‘संगीत रत्नाकर’ काल के रागों और आधुनिक रागों के स्वरूप में अंतर है।
• इनके अतिरिक्त ‘संगीत रत्नाकर’ की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें गन्धार ग्राम का, जो उस समय तक प्रायः लुप्त हो चुका था, विस्तृत प्राप्त होता है।

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