Gandhari-raag-ka-parichay

Raag parichay of Gandhari raag Description notes I Aaroh Avaroh in hindi

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राग गंधारी

  ग ध नि उतरि दोनों ऋषभ, आरोहन ग त्याग।

  ग ध वादी- संवादी ते,   गावत    गंधारी राग।।

Hindi notes of Gandhari raag / राग गंधारी का परिचय 

Gandhari raag description / information in detail-

इस राग की उत्पत्ति आसावरी थाट से मानी गई है। इसमें ग ध नि कोमल तथा दोनों ऋषभ प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गंधार वर्ज्य और अवरोह में सातों स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिये इसकी जाति षाडव- संपूर्ण है। गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है। वादी ध और संवादी ग माना जाता है।

आरोहसा, रे म प, नि , नि , नि सां।

अवरोहसां नि – प, म प रे रे सा।

पकड़ सा नि नि – प, म प , रेरे सा।

थाट -आसावरी थाट

वर्ज्य स्वर – आरोह में गंधार वर्ज्य

जाति – षाडव- संपूर्ण

वादीसंवादी -ध – ग

गायन समय -गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है

राग गंधारी की विशेषता:-

  1. आरोह में शुद्ध और अवरोह में कोमल ऋषभ प्रयोग किया जाता है। रे, ग, ध, नि स्वर कोमल तथा आरोह में शुद्ध रे का प्रयोग होने के कारण मन में यह शंका उठ सकती हैं कि इसे भैरवी थाट के अन्तर्गत क्यों न रखा जाए। इसकी चलन आसावरी प्रधान होने के कारण इसे आसावरी थाट में रखा गया है। स्वर की दृष्टि से भैरवी और आसावरी में केवल ऋषभ का अन्तर है। अतः यह आसावरी और भैरवी दोनों थाटों में रखा जा सकता है, किन्तु चलन आसावरी सा होने के कारण इसे आसावरी थाट में रखा गया है।
  2. इस राग का आरोह जौनपुरी सा और अवरोह बिलासखानी तोड़ी सा है। सवर की दृष्टि से अवरोह भैरवी राग का भी हो सकता है, किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं क्योंकि यह गंभीर प्रकृति का राग है।
  3. यह उत्तरांग प्रधान राग है। इसकी चलन जौनपुरी की तरह मध्य सप्तक के उत्तरांग में तथि तार सप्तक में अधिक होती है, किन्तु पूर्वांग में दोनों ऋषभ के प्रयोग से यह राग स्पष्ट होता है और समप्रकृति रागों से अलग हो जाता है।
  4. इसमें सा की संगति अधिक दिखाई जाती है। कुछ संगीतज्ञ इसी से अपना कार्यक्रम प्रारंभ करते है। जब सा से पर जाते है तो निषाद की मींडयुक्त कण लेते है जैसे- सा नि नि प।
  5. आरोह में ऋषभ पर मध्यम का तथा अवरोह में और रे पर क्रमशः म और ग का कण देते हैं जैसे- स रे म प, रे रे सा।

कुछ विद्वान प सा को क्रमशः वादी संवादी मानते है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। इसके उत्तरांग में प अथवा स्वर वादी का स्थान ग्रहण कर सकता है और पूर्वांग में सा अथवा संवादी का स्थान ग्रहण कर सकता है। को वादी मानने पर को और प को वादी मानने पर सा को संवादी मानना होगा।

न्यास के स्वर, प और

समप्रकृति राग आसावरी और जौनपुरी।

हम पीछे बता चुके हैं कि सा और दोनों ऋषभों का प्रयोग गांधारी राग को आसावरी और जौनपुरी से अलग कर देता है।

Raag parichay of all raags in Indian Classical music..

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