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Raag parichay of Gopika Basant raag Description notes I Aaroh Avaroh in hindi

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राग गोपिकाबसन्त

ग  ध  नि स्वर कोमल  रहे,   मानत   म  स    संवाद।

   प्रात समय  गुनिजन गावत, रखियत आसावरी थाट।।

Hindi notes of Gopika Basant raag / राग गोपिकाबसन्त का परिचय 

Gopika Basant raag description / information in detail-

इसे आसावरी थाट जन्य माना जाता है। इसमें गंधार, धैवत और निषाद स्वर कोमल लगते है। ऋषभ वर्ज्य होने की वजह से इसकी जाति षाडव है। वादी मध्यम और संवादी षडज है। गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है।

आरोह सा, म प नि नि सां।

अवरोह सां नि नि प, म सा।

पकड़   म प, नि सां, नि प म, सा।

थाट -आसावरी थाट

वर्ज्य स्वर – ऋषभ

जाति – षाडव

वादीसंवादी –  म – सा

गायन समय -गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है।

राग गोपिकाबसन्त की विशेषता:-

यह कर्नाटक पद्धति का राग है जिसका प्रचार अब उत्तरी संगीत में काफी हो गया है। ग ध और नि स्वर कोमल होने से इसे आसावरी वर्ग में रखा गया है। स्वर की दृष्टि से इसे भैरवी थाट में भी रखा जा सकता है किन्तु स्वर की अपेक्षा चलन अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण इसे आसावरी थाट में रखा गया है।

  1. इस राग में मालकोश और जौनपुरी राग का सुंदर मिश्रण है, पूर्वांग में मालकोश और उत्तरांग में जौनपुरी है। कुछ विद्वान इसमें मालकोश और भैरवी का मिश्रण मानते हैं।
  2. आसावरी अंग की चलन होने के कारण धैवत पर निषाद का आभास लेते है और म की संगति बार-बार दिखाते हैं। म और सा म की संगति की बहुतायत है।
  3. मोटे तौर से भैरवी राग में ऋषभ वर्ज्य कर देने से इस राग की उत्पत्ति हो जाती हैं।
  4. उत्तरांग प्रधान होने के बावजूद इसकी चलन तीनों सप्तकों में होती है।
  5. यह ख्याल अंग का राग है इसमें ठुमरी नहीं गाई जाती।
  6. कुछ गुनिजन इसमें प वादी और सा संवादी मानते है।

न्यास के स्वर म और प।

समप्रकृति रागपूर्वांग में मालकोश और उत्तरांग में जौनपुरी व भैरवी।

    • पूर्वांग में जब मालकोश अधिक बढने लगता है तो पंचम पर न्यास करते है और जब जौनपुरी की छाया बढने लगती हैं तो नि स्वर-समूह प्रयोग करते हैं और आरोह में पंचम प्रयोग करते हुये मध्यम पर न्यास करते है।
    • चलन.आसावरी प्रधान और ऋषभ वर्ज्य होने से भैरवी राग की छाया नहीं आती। सा म प म स्वरों से भैरवी की छाया आती है, किन्तु उसके बाद सा के प्रयोग से भैरवी का आभास समाप्त हो जाता हैं। सा के बाद सा लेने से मालकोश का भ्रम दूर हो जाता है।
    • उत्तरांग में म प नि सां या नि सा प्रयोग करते है। म प नि सां से भैरवी की छाया आती है तो सां नि म प्रयोग करते है तो मालकोश दिखाई पडने लगता है और जब मालकोश का भ्रम होने लगता है तो पंचम प्रयोग उसका भ्रम दूर करता है। आरोह में निषाद वर्ज्य करने.से आसावरी की छाया आने लगती है। अंत में सा म के प्रयोग से राग गोपिकाबसन्त स्पष्ट हो जाता है।

Raag parichay of all raags in Indian Classical music..

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