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Raag parichay of Yamani Bilawal raag Description notes I Aaroh Avaroh in hindi

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राग यमनी बिलावल

चढ़त तीवर मध्यम लगे, थाट बिलावल कोहि।

प  स वादी सम्वादी ते, यमन बिलावल होहिं।।

Hindi notes of Yamani Bilawal raag / राग यमनी बिलावल का परिचय 

Yamani Bilawal Raag description / information in detail-

 इस राग की रचना कल्याण थाट से मानी गई है। इसमें दोनों मध्यम तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसकी जाति सम्पूर्ण मानी जाती है। वादी स्वर पंचम और संवादी षडज है। गायन समय प्रातःकाल दिन का प्रथम प्रहर है।

आरोहनि, रे ग, म रे ग प, म(t) प, ध  सां।

अवरोह सां नि ध, नि ध प, म॑ प, ग म रे ग, रे सा।

पकड़  प म॑ प, ग म ग रे ग – रे सा, ऩि ध़ ऩि रे ग।

थाट कल्याण थाट

जाति – सम्पूर्ण

वादीसंवादी – प – सा

गायन समय – रात्रि का प्रथम प्रहर

राग यमनी बिलावल की विशेषता:-

  1. इसमें यमन और बिलावल का सुन्दर मेल है। कुछ विद्वान यमन कल्याण और बिलावल रागों का मेल मानते हैं। पं० विनायक राव पटवर्धन ने ऐसा ही माना है।
  2. कुछ विद्वान इसे बिलावल थाट जन्य भी मानते हैं, किन्तु अधिकांश विद्वान इसे कल्याण थाट जन्य मानते हैं।
  3. इसमें दोनों मध्यम प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध मध्यम बिलावल अंग का और तीव्र मध्यम कल्याण अंग का परिचायक है। तीव्र मध्यम अधिकतर आरोह में और शुद्ध अवरोह में प्रयोग किया जाता है जैसे- रे ग म(t) प, ध प म(t) प, ग म रे ग, रे सा, ऩि ध़ ऩि रे सा। कभी कभी तीव्र म अवरोह में यमन कल्याण की तरह प्रयोग किया जाता है जैसे- प म(t) ग म ग रे ग, रे सा, नि सा। तीव्र मध्यम की तुलना में शुद्ध मध्यम का स्थान प्रमुख हैं। कभी कभी आरोह में भी शुद्ध म प्रयोग कर लिया जाता है जो बिलावल अंग का परिचायक है।
  4. यह राग अवरोह में अधिक स्पष्ट होता है। प्रातःकालीन राग अधिकतर अवरोह में ही स्पष्ट होते है।
  5. इस राग का विस्तार मंद्र, मध्य और तार तीनों सप्तकों में समान रूप से होता हैं।
  6. कुछ विद्वान अवरोह में दो धैवतो के बीच अल्हैया बिलावल के समान कभी कभी कोमल नि प्रयोग करते है। कुछ तो.कोमल नि का प्रयोग बहुत अधिक करते है। प्रयोग करने का ढंग इस प्रकार है- ग म रे ग प, ग प ध नि ध प म(t) प। कोमल निषाद का प्रयोग करते हुये भी गाने का प्रचार है। कोमल नि राग अल्हैया बिलावल में प्रयुक्त होता है, बिलावल में केवल शुद्ध नि प्रयोग किया जाता है और इसके न प्रयोग करने से राग हानि भी नहीं होती। अतः कोमल नि को अनुवादी नहीं विवादी स्वर माना जाना चाहिए।
  7. कुछ विद्वान इसे षाडव- सम्पूर्ण जाति का राग मानते है और आरोह में मध्यम वर्ज्य करते है। जो लोग सम्पूर्ण मानते हैं वे भी आरोह में म अल्प प्रयोग करते है।
  8. कुछ गुनिजन इस.राग में सा-प और ग-ध वादी- संवादी मानते है। समय की दृष्टि से तथा उत्तराग प्रधान राग होने के नाते न तो इसमें सा-प और न ग-ध वादी- संवादी माने जा सकते हैं। पंचम इस राग में महत्वपूर्ण स्वर है, अतः इसे वादी माना जा सकता है। स्वरूप और समय की दृष्टि से पंचम का वादीत्व ठीक बैठता है। प वादी होने पर षडज को संवादी मैं माना जाना उचित है।

न्यास के स्वरसा, ग, प।

समप्रकृति रागदेवगिरि बिलावल।

Raag parichay of all raags in Indian Classical music..

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