raag-darbari-kanada-notes-in-hindi

Raag Description of Darbari kanada raag parichay notes I Aaroh Avaroh in hindi

Raag description parichay of raag-Darbari kanada in Indian classical music in hindi is described in this post . Learn indian classical music in simple steps.

राग दरबारी कान्हडा

मृदु ग ध नि शुद्ध ऋषभ, वक्रहिं सब स्वर लाग ।

रि प वादी- सम्वादी ते, कहत कान्हडा राग।।

                            -राग चंद्रिकासार

Hindi notes of Darbari kanada  / राग दरबारी कान्हडा का परिचय 

 इस राग की रचना आसावरी थाट से मानी गई है। ग ध और नि सदैव कोमल लगते है। जाति वक्र सम्पूर्ण है। गायन समय मध्य रात्रि है। वादी स्वर ऋषभ और संवादी पंचम है।

आरोह सा रे – म रे सा, म प, नि नि सां।

अवरोह सां, नि प, म प म रे सा।

पकड़ सा रे – (म) सा रे – सा नि  रे सा।

थाट – आसावरी थाट

वादी -सम्वादी स्वर – रे – प

जाति – वक्र सम्पूर्ण

गायन समय -मध्य रात्रि

राग दरबारी कान्हडा की विशेषता

  • प्राचीन ग्रन्थाकारों में भाव भट्ट के अतिरिक्त किसी भी शास्त्रकार ने दरबारी कान्हडा का उल्लेख नहीं किया है। भाव भट्ट शाहजहां का समकालीन था। अन्य संस्कृत ग्रन्थों में कर्नाट राग का उल्लेख मिलता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि कर्नाट बिगड़ते बिगडते कान्हडा हो गया। अब.प्रश्न यह उठता है कि किस समय से दरबारी शब्द जोड़ा गया। इस शब्द से यह स्पष्ट है कि यह मध्यकालीन शब्द है। कहा जाता है कि तानसेन ने अकबर के सम्मुख कान्हडा राग,जिसे उस समय कर्नाट राग कहते थे, एक नये तरीक़े से गाया। वह राग उसे बहुत पसंद आया होगा। अतः अकबर के अनुरोध से तानसेन ने उसे बार बार गाया होगा इसलिए उसे दरबारी कान्हडा कहा जाने लगा।
  • गंधार आरोह अवरोह दोनों में तथा धैवत केवल अवरोह. में वक्र प्रयोग किया जाता है। लेकिन आश्चर्य यह है कि बहुत से विद्वानो ने ध वर्ज्य कर इसे सम्पूर्ण -षाडव जाति का राग माना है। अगर धैवत अवरोह में वक्र होने की वजह से वर्जित माना जाये तो गंधार ने ऐसा कौन सा कार्य किया है कि उसे आरोह अवरोह दोनों में वक्र होने पर भी कही भी वर्जित नहीं माना जाता। अतः इसे वक्र सम्पूर्ण राग माना जाना चाहिए।
  • दरबारी का कोमल गंधार अन्य सभी राग के कोमल गंधार से अलग है। इसका गंधार एक ओर तो अति कोमल है और दूसरी ओर आंदोलित होता रहता है। आंदोलन ऋषभ की सहायता से करते है जैसे- सा रे रे – रे– रेसा रे सा। कभी कभी सा रे सा। इस प्रकार भी बिना आंदोलन किये प्रयोग किया जाता है। धैवत पर भी गंधार के समान आंदोलन किया जाता है। जैसे- नि नि नि प। कभी भी सा रे म प अथवा प म रे सा या सां नि प, इस प्रकार और सीधा प्रयोग नहीं करते।
  • कान्हडा के18 प्रकार माने जाते है जैसे नायकी कान्हडा, सुहा, सुघराई,अडाना, शहाना इत्यादि। इनका आधार राग दरबारी कान्हडा माना जाता है। म रे सा तथा नि नि प कान्हडांग माने जाते है।
  • इस राग की चलन अधिकतर मंद्र और मध्य सप्तकों में होती है, किन्तु यह मंद्र सप्तक में विशेष खिलता है।अतः यह राग पुरूषों के लिए अधिक उपयुक्त है इसे मर्दाना राग भी कहते है।
  • इसमें सारंग अंग से ताने ली जाती है और बीच बीच में कान्हडा अंग ग म रे सा और नि प लगा देते है जिससे दरबारी कान्हडा स्पष्ट हो जाता है।
  • य आलाप प्रधान राग है। इसमें विलम्बित आलाप और विलम्बित ख्याल अधिक उपयुक्त लगते है।
  • गंधार और धैवत वक्र होने के कारण इसमें नि प और ग म रे सा की संगतियाँ अधिक दिखाई जाती है।

न्यास के स्वर  सा, रे और प।

समप्रकृति राग अड़ाना।

राग अड़ाना म प नि नि सा, नि सां रें सां नि प, निनिपम म रे सा।

राग दरबारी म प नि नि नि प, निनिपमप म – – रेसानिसारे – सा।

Raag parichay of all raags in Indian Classical music..

Pdf of Darbari kanada raag parichay in Indian classical music in hindi is described  in this post  .. Saraswati sangeet sadhana provides complete Indian classical music theory in easy method ..

Click here For english information of this post ..   

Some posts you may like this…

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top
Open chat