Kathak Terms And Definitions in Hindi

Kathak Terms And Definitions in Hindi

Kathak Terms And Definitions in Hindi is described in this post . Kathak shastra notes available on saraswati sangeet sadhana

Kathak Terms And Definitions in Hindi

कुछ पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या

नृत्य –

शरीर के विभिन्न अंगों के संचालन द्वारा मन के भाव प्रकट करने को नृत्य कहते है। नृत्य संगीत का एक अंग है। संगीत के अन्य अंग है गायन और वादन। तीनों एक दूसरे के सहायक होते हैं और तीनों के सहयोग से संगीत पूर्ण होता है।

नृत्य के दो मुख्य प्रकार होते है – पहला लोक और दूसरा शास्त्रीय नृत्य। किसी शुभ अवसर, पर्व या सफलता प्राप्त करने पर खुशी में थिरकने को देशी या लोक नृत्य कहते.है। ऐसे नृत्य में कोई नियम नहीं होता।

जो नृत्य नियमबद्ध होता हैं अर्थात जिसमें नियमानुसार सिर से पैर तक शरीर के विभिन्न अंग चलाये जाते है शास्त्रीय नृत्य कहलाता है।

नाट्य-

नाट्य का अर्थ है नाटक करना। जब किसी पात्र की वेशभूषा, चाल- ढाल, बोली तथा अंग संचालन की नकल की जाये अथवा किसी कथा के अनुसार अभिनय किया जाये उसे नाट्य कहते है।

कथक नृत्य –

यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है। इसका प्रचार उत्तर भारत के अन्य प्रांतों में भी है। इसे पुरुष और स्त्री दोनों अपनी-अपनी विशिष्ट वेशभूषा में करते है। एक व्यक्ति किसी वाद्य पर लहरा देता है तो दूसरा तबला या पखावज में संगति करता है। नर्तक आमद, ठाठ, बोल, तोड़े, परन, टुकड़े, ततकार आदि तैयारी और सफाई के साथ दिखाता है। इस नृत्य में घुँघरू का जैसा जठिल प्रयोग होता है वैसा किसी नृत्य में नहीं होता।

ततकार-

कथक नृत्य में पैर में घूँघरु बाँधने की परम्परा है। लय में पैरो के संचालन से जो ध्वनि उत्पन्न होती हैं उसे ततकार कहते है।

ठाट-

सर्वप्रथम नर्तक रंगमंच पर प्रवेश करता है उसके बाद एक मुद्रा में खडा़ हो जाता है। फिर ताल के.साथ नेत्र भौहं, गर्दन तथा कलाई को चलाता है। बीच – बीच में वह छोटे टुकड़े लेकर सम पर मिल जाता हैं और खड़े होने की मुद्रा बदलता है। कथक नृत्य आरंभ करने के विधि को ठाट कहते है।

सलामी-

इसे नमस्कार भी कहते है। राज दरबारों में पहले नर्तक किसी तोड़े द्वारा राजा को नमस्कार करता था जिसे सलामी कहा जाता था।

आमद –

जिस टुकड़े से नर्तक अपना नृत्य प्रारंभ करता है उसे आमद कहते है। ठाट के बाद आमद का टुकड़ा नर्तक नाचता है।

टुकड़ा –

नृत्य के बोलों के छोटे समूह को टूकडा कहते है। यह अधिकतर एक आवृत्ति में सम से सम तक होता है। कुछ टुकड़ों के अंत में तिहाई होती हैं और कुछ टुकड़े तिहाई रहित होते है।

परन –

नृत्य के जोरदार बोलो का वह समूह जो दो, तीन, चार, अथवा अधिक आवृत्तियों का हो उसे परन कहते हैं। इसमें अधिकतर शब्द दोहराते हुये चलते है। परन दो प्रकार का होता है तिहाईदार और बिना तिहाई का। तिहाईदार परन का एक प्रकार चक्कदार परन होता है। इस परन में तिहाई अवश्य होती है।

चक्कदार परन –

जिस प्रकार किसी तिहाई में किसी बोल समूह को तीन बार नाच कर सम से मिलते है, उसी प्रकार चक्कदार परन में किसी वजनदार और खुले बोल समूह को तीन बार बजाकर सम पर आते है। इसलिये चक्कदार परन को तिहाई का एक विशिष्ट प्रकार भी कहा जा सकता है। नीचें तीनताल में चक्कदार परन का एक नमूना देखिये—

 गत –

कथक नृत्य में गत का बडा महत्व है। यह गति का बिगड़ा हुआ रुप है। सितार- सरोद आदि वाद्यो में बजाई जाने वाली बंदिश को गत कहते है। नृत्य में गत को मुख्य दो प्रकार से प्रयोग किया जाता हैं – गत निकास और गत भाव।

गत निकास –

इसमें नर्तक किसी एक मुद्रा से निकलकर आता है और उसी मुद्रा में ठाह व दुगुन में चलन करके दिखाता है। निकास का अर्थ निकलना। गत निकास का विकास लखनऊ घराने में विशेष रूप से हुआ। यह कथक नृत्य का सुन्दर अंग है।

गत भाव –

इसमें नर्तक अकेले ही किसी कथानक के भाव को अंग- संचालन द्वारा प्रकट करता है। नर्तक सभी पात्रों का अभिनय अकेले ही एक दूसरे के बाद करता है।

टुकड़ा तोड़ा-

नृत्य में तालबद्ध बोलो के छोटे समुह का टुकड़ा और बडें समूह को तोड़ा कहते है। टुकड़ा और तोड़ा दोनों समाप्त होने पर सम पर आते है। टुकड़ा छोटा होता है और तोड़ा बडा होता है।

पढन्त –

कभी कभी नर्तक नृत्य के किसी बोल की बारिकियों को समझाने के लिए नाचने से पहले मुख से पढकर उसे लय ताल में सुना देता है जिसे पढन्त कहते है।

निकास –

नर्तक रंगमंच पर नृत्य करने के लिए एक मुद्रा में खडा़ हो जाता है और एक दूसरे के बाद कई मुद्राएं दिखाता है। एक मुद्रा से दूसरी मुद्रा में जाने को निकास कहते है।

अंग –

मनुष्य के शरीर के विभिन्न हिस्सों को अंग कहा जाता है। नृत्य में मुख्य 6अंग माने गये सिर,  हाथ, वक्ष, बगल, कमर और पैर।

प्रत्यंग –

शरीर के अंगों को जोडऩे वाले भाग जिसे नृत्य करते समय सरलता से मोड़ा जा सकता है प्रत्यंग कहलाते है जैसे – गर्दन, कन्धा, पीठ, जांघ, बांह और पुष्टिका।

उपांग –

शरीर के छोटे-छोटे अंगों को उपांग कहा गया है।जो नृत्य के लिए आवश्यक है जैसे – नेत्र, भौहं, आँख की पुतली, पलक, ओठ, दाँत, जबड़ा, जीभ, मुख, नाक, गाल और ठुड्डी, एडी, टखना, पंजा और अंगुलियां।

हस्तक –

कथक नृत्य में लय ताल में हाथ के संचालन को हस्तक या हस्त मुद्रा कहते है। आकर्षक नृत्य के लिए हाथों का संचालन सुन्दर और नियमानुसार होना चाहिये। कुछ विद्वान मुद्रा को ही हस्तक कहते है, किन्तु यह ठीक नहीं क्योंकि हस्तक शब्द स्वयं अपने अर्थ का परिचय देता है। हस्तक में हाथ का संचालन होता है। इनका विकास विभिन्न घरानों में अलग – अलग ढंग हुआ है। हस्तक से किसी भाव की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि टुकड़े परन आदि में इनका प्रयोग होता है।

अदा –

कथक नृत्य में किसी विशेष भाव को स्पष्ट करने को अदा कहते है। जब ठुमरी अथवा किसी श्रृंगार प्रधान गीत का भाव मुद्राओं द्वारा प्रकट करते है तो उसे अदा कहते है।

घुमरिया –

नृत्य करते समय एक स्थान पर तीव्र गति से चक्कर लगाने को घुमरिया कहते है। यह क्रिया कथक नृत्य की अपनी निजी विशेषता है।

तैयारी –

द्रुत लय में सफाई के साथ नाचना तैयारी कहलाता है। तैयारी में ततकार, अंग- संचालन, भाव प्रदर्शन  आदि की सफाई और चपलता आती है।

अन्चित –

पैर के दोनों पंजे उठाकर केवल एडी से पृथ्वी को आघात करने को अन्चित कहते है।

कुन्चित –

एडी उठाकर खाली पंजे से पृथ्वी पर आघात करने के बाद उसे दूसरे पैर के पीछे ले जाने को कुन्चित कहते है।

विक्षिप्त –

यह एक प्रकार के अंग संचालन का नाम है। शरीर के किसी अंग को झिटकने को विक्षिप्त कहते है।

गति –

पैरों की क्रिया को गति कहते है। गति के मुख्य दो प्रकार होते है- चलित और स्थिर। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने को चलित और एक स्थान पर खडे रहकर चलने का भाव दिखाने को स्थिर गति कहते है।

अभिनय –

नर्तक जब किसी के कार्यों की नकल करता है तो उसे अभिनय कहते है।

पिन्डी –

नृत्य में विभिन्न परिवर्तनों अर्थात नृत्य के एक विशेष आकृति को जिसमे करण अथवा अंगहार सम्मिलित रहते है, पिन्डी कहते है। भिन्न भिन्न नृत्यों की अलग अलग पिन्डियाँ होती हैं।

स्थानक –

 शरीर को बिना हिलाये- डुलाये खड़े रहने की विभिन्न स्थितियों को स्थानक कहते है। नाटयशास्त्र में भरत ने 6 स्थानक बताये है , उनके नाम है सम्पाद, वैष्णव, मण्डल, वैशाख, आलीढ और प्रत्यालीढ। नृत्य में स्थानक का बडा महत्व है क्योंकि इसी से नृत्य प्रारंभ होता हैं। और इसी पर समाप्त होता है।

रेचक –

शरीर के विभिन्न अंगों को लय में चक्राकार संचालन करने को रेचक कहते है। भरत मुनि के अनुसार इसके चार प्रकार होते है – पद रेचक, कटि रेचक, हस्त रेचक और ग्रीवा रेचक। संक्षेप में पैरों का संचालन पद रेचक, कमर का संचालन कटि रेचक, हाथों की क्रिया हस्त रेचक और गर्दन हिलाना ग्रीवा रेचक कहलाता है।

पाद –

विच्छेप – पैरों के संचालन को पाद विच्छेप कहते है। इसके दो प्रकार है चारी और गति। यह नृत्य का महत्वपूर्ण अंग है।

स्तुति –

नृत्य द्वारा ईश्वर की आराधना करने को स्तुति कहते है। नर्तक नृत्य के प्रारंभ में गणेश, गुरु या सरस्वती की वंदना करता है। जिसे स्तुति कहते है।

बोल –

तालबद्ध रचना को बोल कहते है। इसके मुख्य तीन प्रकार है, नृत्यांगी, तालांगी और कवितांगी।

करण –

नृत्य में हाथ पैर के संयुक्त चलन को करण कहते है। इसके अनेक प्रकार संभव है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में 108 प्रकार के करण बताये है। भगवान शंकर के ताण्डव नृत्य में इसका बडा महत्व है।

अंगहार –

शरीर के विभिन्न अंगों को ठीक प्रकार से रखने को अंगहार कहते है। इसकी रचना करणों को मिलाने से होती हैं इसलिये इसे भी ताण्डव नृत्य में बडा महत्वपूर्ण माना जाता है। भरत मुनि ने 32 प्रकार के अंगहार बताये है।

भंगि- भेद –

जब नृत्य में कोई स्थानक बनाकर खडे होते हैं तो शरीर को सीधा या एक या दो टेढ़ा करके मुद्रा बनाते.है जिसे भंगि- भेद कहते है।

पलटा –

गायन, वादन या नृत्य किसी में भी विभिन्न प्रकार से बोलो के क्रम बदलने को पलटा कहते है। नृत्य में ततकार या टुकड़े,तोड़ो में बोलो का क्रम चमत्कार हेतु बदला जाता हैं। यही क्रिया  वादन और गायन में भी होती हैं। तबला में कायदा के बोलो को उलटने- पलटने को पलटा कहते है। गायन में भी अलंकार को पलटा कहते.है। नृत्य के गतों में हस्तक बदलने को भी पलटा कहतें है। गत भाव में इसका विशेष महत्व होता हैं।

चलन –

अपने स्थान से स्वभाविक रूप से चलने को चलन या चाल कहते हैं। नृत्य में इसके अनेक प्रकार प्रचलित हैं।

फिरन –

इसका शाब्दिक अर्थ है घूमना या वापिस होना। पहले चलन और उसके बाद फिरन होता है। निकास की गतों में नर्तक, पहले  आगे बढता है और फिर उसी मुद्रा में वापिस होता है। उसके वापिस होने को फिरन कहते है।

कसक –

कथक नृत्य में सुन्दरता के साथ लय ताल में कलाई चलाने को कसक कहते है।

मसक –

साँस लेने व छोडऩे में वक्ष के उतार- चढाव को मसक कहा गया है। नृत्य में जिस प्रकार चलन- फिरन शब्द एक साथ प्रयोग होता है उसी प्रकार कसक – मसक एक साथ प्रयोग किया जाता है।

कटाक्ष –

बोलचाल की भाषा में कटाक्ष का अर्थ है तिरक्षी दृष्टि से देखना, किन्तु कथक नृत्य में इसका अर्थ  अलग है। जब नृत्य में किसी बोल, तोड़ा अथवा मुखडा लेकर सम से मिलते है तो अचानक दृष्टि को एक स्थान पर फेंकते है। एक कोण में अचानक दृष्टि फेंकने को कटाक्ष कहते है।

नाज-

जब नर्तकी नखरे दिखाते हुए चटक मटक के साथ नृत्य करती हैं तो उसे नाज़ कहते है। नाज का अर्थ है नखरा या घमंड।

अंदाज

– इसका शाब्दिक अर्थ है तौर तरीका और ढंग। कथक नृत्य में इस शब्द का बहुत अधिक प्रयोग होता है। जैसे ततकार का अंदाज,  बोल पढने का अंदाज, खड़े होने का अन्दाज ईत्यादि।

कवित्त-

राधा कृष्णा से संबंधित कविता का भाव नृत्य द्वारा दिखाने की परम्परा है। जब किसी कविता को लय ताल बद्ध कर नृत्य के बोलो के साथ प्रस्तुत किया जाता हैं तो उसे कवित्त कहते.है।

प्रिमलू-

जब नृत्य के बोलो के साथ तबला-पखावज के बोल तथा कविता मिलाकर नृत्य करते हैं तो उसे प्रिमलू कहते.है।

काल –

गायन, वादन तथा नृत्य में जो समय लगता है उसे काल कहते है। काल मापने के लिये मात्रा और ताल बनाये गये।

लय –

गायन, वादन तथा नृत्य की रफ्तार को लय कहते है। संगीत में लय बहुत आवश्यक है। लय के तीन. प्रकार माने गए है विल्मबित लय, मध्य तथा द्रुत लय।

1.विल्मबित लय –

जब लय बहुत धीमी होती हैं तो उसे विल्मबित कहते हैं।

मध्य लय –

साधारण लय को मध्य लय कहते है।

द्रुत लय-

जब लय तेज होती है तो उसे द्रुत लय कहते है।

संगीतज्ञ अपनी इच्छानुसार लय धीमी तेज कर लेता है। मोटे तोर से विल्मबित लय की दूनी मध्य और मध्य की दूनी द्रुत कहीं जाती है। घडी की एक टिक मध्य लय के बराबर मानी जाती है।

मात्रा –

संगीत में समय नापने के पैमाने को मात्रा कहते है। जिस प्रकार तोल नापने के लिए कि० ग्राम आदि बनाये गये है लम्बाई नापने के लिये से० मी०,मी० आदि बनाये गये है उसी प्रकार संगीत में समय नापने के लिए मात्रा बनाई गई है। विल्मबित लय में एक मात्रा बडा, मध्य में साधारण, द्रुत लय में छोटा होता है।

ताल –

विभिन्न मात्रा के समूह को ताल कहते है। यह ‘काल’ नापने का पैमाना है। केवल मात्रा सें काम पूरा नहीं होता इसलिये ताल बनाये गये है। ताल मात्राओं का एक समूह है। 16 मात्रा के समूह को तीनताल तथा 10 मात्रा के समूह को झपताल कहते है।

आवर्तन –

किसी ताल की पूरी मात्राओं या उसके सम्पूर्ण बोल से एक आवर्तन होती. है। जैसे धा धी ना। धा तू ना। से दादरा ताल की एक आवर्तन पूरी होतीं है।

ठेका –

किसी ताल के निश्चित बोल को ठेका कहते हैं जैसे झपताल का ठेका धी ना। धी धी ना। आदि है।  ठेका को तबले अथवा पखावज पर बजाया जाता है।

सम –

प्रत्येक ताल की पहली मात्रा सम कहलाती हैं। सम पर पहली ताली पड़ती हैं। तबले का ठेका सम से अर्थात पहली मात्रा से शुरू होता है। गाना बजाने व नृत्य में सम पर एक विशेष जोर पड़ता है।

ताली – खाली –

हाथ से ताल लगाते समय सम के बाद जहाँ पर ताली देते है उसे ताली या भरी और जहाँ हाथ एक ओर हिला देते है उसे खाली कहते.है।

विभाग –

प्रत्येक ताल के कुछ स्वभाविक खण्ड या हिस्से होते. है जिन्हें विभाग कहते है। जैसे तीनताल में चार विभाग होते है।

जाति –

जाति से किसी ताल के विभाग की मात्रा की संख्या का बोध होता है। जब किसी विभाग की मात्रा बदल जाती है तो उसकी जाति भी बदल जाती है। दादरा ताल तिस्त्र जाति की ताल है क्योंकि इसके प्रत्येक विभाग में तीन मात्रायें है। इसी प्रकार तीनताल चतस्त्र जाति की ताल है क्योंकि इसके प्रत्येक विभाग में चार मात्रायें है। इस प्रकार जातियाँ पांच है – चतस्त्र, तिस्त्र,  मिश्र खण्ड और संकीर्ण। चतस्त्र जाति के विभाग में चार, तिस्त्र में तीन, मिश्र में सात, खण्ड में पांच और संकीर्ण जाति के ताल के प्रत्येक विभाग में नौ मात्राएँ होती हैं। जिस ताल के सभी विभाग बराबर मात्रा के नहीं होते, उसकी जाति निर्धारित नहीं की जा सकती। कर्नाटक ताल पद्धति में जाति बदलने से केवल लघु की मात्रा बदलती है।

दुगुन, तिगुन और चौगुन – एक मात्रा में दो मात्रा के भाग बोलने को दुगुन, तीन मात्रा के भाग बोलने को तिगुन, और चार मात्रा के भाग बोलने को चौगुन कहते है। दुगुन, तिगुन, चौगुन आदि करने को लयकारी दिखाना कहते है। लयकारी के कुछ उदाहरण नीचें देखिये—

दुगुन – धाधिं    धिंधा

तिगुन – धाधिंधिं  धाधाधिं

चौगुन – धाधिंधिंधा  धाधिंधिंधा

तिहाई –

किसी वर्ण समूह को तीन बार नाचकर या तबला पर बजाकर सम पर आने को तिहाई कहते है।

तिहाई की क्रिया गायन , वादन , तथा नृत्य तीनों में की जाती है , किन्तु नृत्य में इसका बहुत महत्व है । अधिकार तटकर , तुकरे आदि तिहाई से समाप्त होते हैं । तिहाई से दर्शकों को अधिक आनंद मिलता है ।

History of Kathak Dance in Hindi & Kathak Ke Gharane is described in this post

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