Kathak Nratyakar ki Veshbhusha in Hindi

Kathak Nratyakar ki Veshbhusha in Hindi Kathak Theory Shastra

Kathak Nratyakar ki Veshbhusha in Hindi is described in this post . Kathak shastra notes available on saraswati sangeet sadhana

Kathak Nratyakar ki Veshbhusha in Hindi

नृत्यकार की वेश – भूषा –

सफल नृत्य प्रदर्शन के लिये कई बातों की आवश्यकता होती है । ↑ अभ्यास और शिक्षा जितनी आवश्यक है उतनी ही आवश्यक पोशाक और मेकअप ( रूप सज्जा ) है । साथ ही नृत्य के साथ उत्तम संगति भी होती चाहिये । मणिपुरी , भरतनाट्यम और कथकलि नृत्यों में संगति के लिये , कथक नृत्य की अपेक्षा अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है । इनके अतिरिक्त रंगमंच की उचित व्यवस्था भी होनी चाहिये । कभी पैरों से चादर सिमटने लगती है , कभी तख्त हिलने लगता है तो कभी रोशनी की व्यवस्था ठीक नहीं होती है जिसके कारण नृत्य का कार्यक्रम असफल हो जाता है , इसलिये इन सब बातों पर भी ध्यान रखना चाहिए । बिना प्रकाश की उचित व्यवस्था के पोशाक और मेकअप प्रभावहीन हो जाते हैं । अतः पोशाक के साथ – साथ स्टेज , प्रकाश और ध्वनि का उचित प्रबन्ध होना चाहिए । नीची हम कथक नृत्य की वेश – भूषा पर प्रकाश डाल रहे हैं ।

पुरुष वेश – भूषा – 

कथक नृत्य की परम्परागत वेश – भूषा मुसलमानी है । मुगलकाल में नृत्यकारों को विशेष राज्याश्रय मिला , फलस्वरूप नृत्य में श्रृंगारिक हाव – भाव एवम् मुद्राओं की बहुतायत हो गई और नृत्य की वेश – भूषा मुसलमानी हो गई जो अब तक चली आ रही है । इस वेश – भूषा में चूड़ीदार पायजामा और घेरदार बाराबंदी या कुरता पहनते हैं । ऊपर से शेरवानी पहन लेते हैं । सिर में कामदार जरी या साटन की दुपलिया या चुन्नटदार टोपी पहनते हैं । कभी – कभी सिर खाली भी रहता है । इस वेश – भूषा को इस पुस्तक में दिये गये बिंदादीन महाराज के चित्र में देखिये ।

कुछ नर्तक कुरते के ऊपर खुले गले का वास्केट भी पहन लेते हैं और एक कन्धे से लेकर कमर तक तिरछा दुपट्टा बाँध लेते हैं ।

 कथक नृत्य की दूसरी पोशाक में कामदार या सादी धोती पहनते हैं । कमर के ऊपर का भाग खुला रहता है और दोनों जंघों पर एक दुपट्टा रहता है । यह वेश – भूषा मुगलों के पहले की मालूम पड़ती है और कृष्ण की वेश – भूषा के समीप है । कृष्ण की भूमिका में इसी वेश – भूषा को पहनते हैं और उस समय सिर पर मुकुट लगा लेते हैं ।

स्त्री वेश – भूषा –

कथक नृत्य के लिए स्त्रियों की वेश – भूषा साड़ी और ब्लाउज है । साड़ी उल्टे पल्ले की होती है । यह उत्तर प्रदेश और बंगाल की स्त्रियों के पहनावे के समान है । स्त्रियाँ धोती के नीचे चूड़ीदार पायजामा पहनती हैं , क्योंकि चक्कर लगाने के लिये धोती बहुत उचित वस्त्र नहीं है । सुश्री दमयन्ती जोशी का चित्र इसी वेश भूषा में है । स्त्रियों की दूसरी पोशाक चूड़ीदार पायजामा तथा घेरदार कुरता है । स्त्रियों का कुरता पुरूषों की तुलना में अधिक नीचा होता है । कुरता के ऊपर दुपट्टा होता है जिससे वृक्ष को ढक लेते हैं । स्त्रियों की तीसरी पोशाक लहंगा , अँगिया और चुनरी होती है । लँहगा के नीचे चूड़ीदार पायजामा पहनती हैं । नर्तक के सामने अपने लिये उपयुक्त पोशाक चुनने की समस्या आती है । इसके लिये कोई विशेष नियम नहीं बनाये गये हैं । नृत्य के भाव और अवसर के अनुसार पोशाक होनी चाहिये । कलाकार स्वयं अपनी रुचि के अनुसार वस्त्रों का रंग चुनता है ।

वस्त्र के रंगों का चुनाव –

उपयुक्त पोशाक चुनने के बाद नर्तक के समक्ष वस्त्रों के रंग की समस्या आती है कि वह किस रंग की पोशाक पहने । वस्त्रों के रंगों का मिलान साधारणतया दो प्रकार का होता है- मेल खाते हुए रंग और विरोधी रंग चूड़ीदार पायजामा तो सदैव सफेद रहता ही है । इसके अतिरिक्त ऊपर – नीचे के वस्त्रों और दुपट्टा में रंगों का मिलान रक्खा जाता है । रंगों मिलान देश – काल के अनुसार जैसा फैशन हो वैसा चुनना चाहिये । वस्त्र प्राकृतिक और सादे होने चाहिये जिनका प्रभाव दर्शकों पर अच्छा पड़ता है । वस्त्र ऐसे न हों कि या तो नर्तक का व्यक्तित्व उनसे छिप जाय और या दर्शक केवल उनकी चमकीली कामदार या रंग – बिरंगे वस्त्र ही देखते रहें और या बिना उचित वस्त्र के नर्तक का व्यक्तित्व ही निखर न सके ।

 वस्त्रों की फिटिंग –

केवल वस्त्रों का चुनाव और रंग ही आवश्यक नहीं है , बल्कि उनकी सिलाई और फिटिंग भी उतनी ही महत्वपूर्ण है । आज के नवीनतम फैशन के अनुसार वस्त्र इतने चुस्त न होने चाहिये कि अंग संचालन में कठिनाई हो । उसकी फिटिंग भी ऐसी न होनी चाहिये कि अश्लील मालूम पड़े । फिल्मी नृत्यों में तो अश्लीलता थोड़ी – बहुत आ ही जाती है , किन्तु शास्त्रीय नृत्य में अश्लीलता नहीं आनी चाहिये । सिल्क , जारजेट , नाइलोन आदि के कपड़े इस दृष्टि से अच्छे समझे जाते हैं , क्योंकि इनमें सिकुड़न नहीं आती और सूक्ष्म से सूक्ष्म अंग – संचालन दर्शक देख सकते हैं ।

आभूषण –

स्त्रियों के लिए आभूषण चुनने की समस्या आती है । साधारणतः स्त्री नर्तकियाँ माला , अँगूठी , कंगन , नेकलस , भुजबंध , टीका , लार्केट आदि आभूषण पहनती हैं । इनका उचित चुनाव भी आवश्यक है । आभूषण इतने अधिक न हों कि अंग – संचालन में कठिनाई हो । वे जो भी हों साधारण तथा ठीक से बँधे हो और नृत्य में बाधक न हों । फूलों के आभूषण भी पहने जाते हैं । ये हल्के होते हैं और थोड़ी बहुत सुगन्धि फैलाकर वातावरण रसमय कर देते हैं ।

 नाट्यशास्त्र और संगीत रत्नाकर में नर्तकी की वेष –

भूषा पर विस्तार में प्रकाश डाला गया है । इनमें इस बात पर बल दिया गया है कि भाव के अनुसार पोशाक होनी चाहिये जिससे कि अंग संचालन स्पष्ट दिखाई दे सके और नर्तक का सौन्दर्य निखर सके । नाट्यशास्त्र में प्रत्येक अंग के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है ।

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