Detail study of Geet govind I Raag tatvivod I Chaturdandiprakashika I Swarmailkalnidhi in hindi

Detail study of Geet govind I Raag tatvivod I Chaturdandiprakashika I Swarmailkalnidhi in hindi in Indian classical music  in hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Detail study of Geet govind I Raag tatvivod

Geet govind / गीत गोविंद

 

  • संगीत के महान पंडित एवमं संगीतज्ञ पं० जयदेव ने इस अमर कृति की रचना 12वी शताब्दी में की थी। उनका जन्म बंगाल के केंडला नामक स्थान में हुआ। उनकी पत्नी का नाम पद्मावती था जो पूरी उडीसा की रहने वाली थी। गीत गोविंद में राधा कृष्ण से संबंधित प्रबंध गीत है जो विभिन्न रागों में गाये जाते हैं। उनके पद भाव, रस और लालित्य में उद्यकोटि के है। उनके गीतों में मथुरा वृन्दावन की झांकी और राधाकृष्ण की प्रेमलीला का विशद वर्णन मिलता है। जब श्रीकृष्ण गोकुल से मथुरा चले जाते हैं तो गौप- गौपिया, और राधा उनकी विरह से परेशान हो जाते है। उनके गीत राधा को कृष्ण की और कृष्ण को राधा की मन की स्थिति का ज्ञान कराती है। जयदेव का संपूर्ण जीवन कृष्णमय था।
  • विद्यापति और चन्डीदास ऐसे कवि जयदेव के गीतों से बडे प्रभावित थे। राजशिव सिंह ने विद्यापति को ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि से विभुषित किया। कुछ विदेशी विद्वान भी उनके पदों से प्रभावित हुये। सर एडविन अनल्डि ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया और इसका नाम (The Indian song of songs) अर्थात भारतीयों गीतों का गीत रखा। अंग्रेजी के अतिरिक्त इसका अनुवाद लैटिन और फ्रेंच भाषा में हो चुका है।

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Raag tatvivod / राग तत्वविवोध

 

    • यह ग्रंथ श्रीनिवास द्वारा18वीं शताब्दी में लिखा गया था। यद्यपि यह छोटा सा ग्रन्थ है, किन्तु कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। श्रीनिवास ने कई स्थलों पर अहोबल को ही अनुसरण किया है, किन्तु कही उनसे आगे भी बढ गये है। अहोबल के ढंग पर उसने वीणा के तार पर बारह स्वरों की स्थापना की और स्पष्ट शब्दों में इस क्रिया को समझाया। श्रीनिवास ने अन्य प्राचीन ग्रन्थकारों के समान सभी स्वरों को उनकी अंतिम श्रुति पर रखा और अपना शुद्ध थाट आधुनिक काफी थाट के समान माना।
    • श्रीनिवास ने 12 श्रुतियों के प्रयोग की आज्ञा दी है जिन पर 12 स्वर स्थित है। मेलों के वर्णन में उसने इतनी ही श्रुतियों अर्थात स्वर का प्रयोग किया है। उसने एक मेल से स्वरों की संख्या के आधार 484 रागों की रचना की है। उसकी बताई हुई विधि की आज भी मान्यता है।
    • श्रीनिवास ने मेल औडव, षाडव, सम्पूर्ण, थाट रचना विधि आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला है, किन्तु ग्राम, मूर्छना आदि प्राचीन विषयों पर बहुत कम लिखा है। इन तथ्यों से यह स्पष्ट है कि उसे आधुनिक संगीत का जन्मदाता कहा जा सकता है। रागाध्याय में उसने अहोबल का ही अनुसरण किया है।

Detail study of Chaturdandiprakashika I Swarmailkalnidhi

 

Chaturdandiprakashika /चतुर्दन्डिप्रकाशिका

 

  • सन 1660 में दक्षिण भारत के पंडित व्यंकटमूखी द्वारा यह ग्रंथ लिखा गया। यह दक्षिणी संगीत का ग्रन्थ है और शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर पर बहुत कुछ आधारित है।
  • इसकी मुख्य विशेषता यह है कि सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ में यह सिद्ध किया गया है कि गणित के द्वारा एक सप्तक से अधिक से अधिक 72 थाटो की रचना हो सकती है, किन्तु उन्होंने व्यवहार के लिए19 थाटो को ही मान्यता दी है। उनके नाम है मुखारी, सामवराली, भूपाली, हजुज्जी, बसंत भैरवी, गौल, भैरवी, अहीरी, श्री, काँबोजी, शंकराभरण, सामन्त, हेशाशी, नाट्ट, शुद्ध वराली, पंतुवराली, शुद्धरामक्री, सिंहराव और कल्याणी।
  • व्यंकटमूखी ने सात शुद्ध और पांच विकृत स्वर माने है। विकृत स्वर के नाम है- साधारण गंधार, अंतर गंधार, वराड़ी मध्यम, कैशिक निषाद और काकली निषाद।

Swarmailkalnidhi / स्वरमेलकलानिधि

 

  • यह ग्रन्थ 1550 में दक्षिणी भारत के पं० रामामात्या द्वारा लिखा गया है। इसका अनुवाद हिन्दी में भी हो चुका है। यह छोटी सी पुस्तिका है जिसके 5 अध्याय है। उनके नाम है उपोदघातप्रकरण,स्वरप्रकरण, वीणाप्रकरण, मेलप्रकरण और रागप्रकरण।
  • स्वरप्रकरण में संगीत को दो भागों में बाँटा गया है गांधर्व और गान। गांधर्व संगीत को मार्गी संगीत जिसके द्वारा मोक्ष संभव था और गान को देशी संगीत कहा  है जो जन रूचि के अनुसार बदला करता है। उसने इस भेंद को शारंगदेव द्वारा कृत संगीत रत्नाकर से लिया है। इसके बाद उसने 22 सौ श्रुतियों का उल्लेख किया है और 7 शुद्ध और 7 विकृत स्वरों का वर्णन किया है। उसने कुल 14 स्वर बताये है ।  वीणा प्रकरण के अन्तर्गत  उसने वीणा के तार पर 14 स्वरों की स्थापना की है। मेल प्रकरण के अन्तर्गत उसने 20 मेल बताये है और राग प्रकरण में 63 जन्यरागों का उल्लेख किया है।
  • उसके चौदह स्वरों के नाम है- शुद्ध षडज, शुद्ध ऋषभ, शुद्ध गंधार या पंचश्रुति ऋषभ, साधारण ग या षटश्रुति ऋषभ, अंतर गंधार, च्युत मध्यम गंधार, शुद्ध मध्यम, च्युत पंचम, शुद्ध पंचम, शुद्ध धैवत, शुद्ध निषाद या पंचश्रुति धैवत, कैशिक निषाद या षटश्रुति  धैवत, काकली निषाद और च्युत षडज निषाद।

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