masitkhani gat & rajakhani gat

Masitkhani & Rajakhanai gat in Indian classical music in Hindi / गत की परिभाषा

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Gat in Indian classical music / गत

वाद्य पर बजाई जाने वाली राग-ताल बद्ध रचनाये गत कहलती हैं। सितार पर मुख्य रूप से दो प्रकार की गतें बजाई जाती हैं –

Defination of Masitkhani gat / मसीतखानी गत

इसका आविष्कार अमीर खुसरों के वंशज मसीत खाँ ने किया था । यह विलंभित तीनताल में बजाई जाती है । इसमें गत के पहले विस्तार में आलाप करते हैं जो ध्रुपद के नोम तोम आलाप के समान होता है । आलाप की गति धीरे धीरे बड़ाई जाती है और अंत में झाला बजा कर समाप्त करते हैं और गत शुरू करते हैं । गत सदेव 12 वी मात्रा से आरंभ होती है । गत के बोल इस प्रकार होते हैं , दिर । दा दिर दा रा । दा दा रा दिर । दा दिर दा रा । दा दा रा इसमें मींड , सूत ,गमक , आदि खूब प्रयोग करते हैं । इसे पच्छिमी अथवा दिल्ली बाज भी कहते हैं ।

 

Defination of Rajakhani gat / राजखनी गत

इसका आविष्कार रजा खाँ ने किया था । यह द्रुत लय में बजाई जाती है ।

इसके बोल मसीतखानी गत  के समान पहले सा निश्चित नहीं होते बल्कि इसमें आवश्यकता अनुसार अलग अलग बोल प्रयोग किए जाते हैं ।

इसमें तैयारी  के साथ तोड़े बजाए जाते हैं और अंत में झाला के विभिन्न प्रेकार बजकर गत समाप्त करते हैं । इसे पूर्वी अथवा लखनऊ बाज कहते हैं ।

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Defination of  Gat , masitkhani gat and rajakhani gat in Indian classical music in Hindi

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