Detail study of Musical elements in Natya shastra in hindi

Detail study of Musical elements in in Indian classical music  in hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Detail study of Natya shastra 

 

नाटयशास्त्र

 

  • स्वयं नाम से स्पष्ट है कि यह ग्रंथ नाट्य पर लिखा गया है, किन्तु इसके अंतिम 6 अध्यायो में 28 से 33 तक संगीत शास्त्र का विवेचन किया गया है। इस ग्रंथ के लेखक थे महर्षि भरत। इस नाम के अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति हो चुके है,किन्तु नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत अन्य भरत से भिन्न है। इनके समय के विषय में विद्वानों मतभेंद है, किन्तु सभी ने पाँचवी छठ़वी शताब्दी के आसपास माना है।
  • भरत ने नाट्यशास्त्र के 28 वे अध्याय में वाद्यो के प्रकार, श्रुति, स्वर, ग्राम, मुर्छना, जाति भेद तथा उनके लक्षण ग्रह, अंश, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व, औडवत्व आदि पर प्रकाश डाला है। 29 वे अध्याय में विभिन्न प्रकार की वीणा, उनकी वादन विधि, जातियों की रसानुकूल प्रयोग का विवरण है। 30 वे अध्याय में सुषिर वाद्यो का विवरण, 31 वे अध्याय में कला, लय और विभिन्न तालों का विवरण दिया गया है।
  • 32 वे अध्याय में गायक- वादक के गुण, ध्रुव के 5 भेंद, छंद आदि तथा 33 वे अध्याय में अवनद्ध वाद्यो की उत्पत्ति, भेंद, वादन विधि, वादकों के लक्षण आदि दिये गए हैं। इस प्रकार इन 6 अध्यायों में 28 और 29 अध्याय बडे महत्वपूर्ण है, किन्तु इनके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र का 6ठा और 7वाँ अध्याय भी संगीत के लिए बडा महत्वपूर्ण है। जिसमें रस संबंधी बातों पर विवेचन है। 6ठें अध्याय में रस के लक्षण और व्याख्या, भाव-लक्षण और व्याख्या, आठों रसों का वर्णन, रस के देवता और वर्ण तथा सातवें अध्याय में भाव, विभाव, अनुभाव आदि की व्याख्या, स्थायी, व्यभिचारी, और सात्विक भावों का विवरण दिया गया है।
  • नाट्यशास्त्र प्रथम उपलब्ध ग्रन्थ है जिनमें संगीत के आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला गया है। इसके पूर्व के ग्रन्थों में केवल संगीत वाद्यो और संगीत उपमायों का उल्लेख मिलता है। यह ग्रन्थ इस बात का प्रमाण है कि उस समय संगीत और नाट्य का घनिष्ठ संबंध था, अन्यथा संगीत पर पृथक रूप से विचार नहीं किया जाता। अन्तर्साक्ष्य प्रमाणो से यह भी स्पष्ट है कि भरत को संगीत का अच्छा ज्ञान था और उसे अपने कानों पर बडा विश्वास था। ‘ सारणां चतुष्टयी’ प्रयोग का वर्णन करते समय उसने स्पष्ट रूप से लिखा है कि संवाद भाव को परखने के लिए मात्र प्रशिक्षित कान पर्याप्त है। गणित से कभी कभी त्रुटि संभव है, किन्तु प्रशिक्षित कानों से त्रुटि असंभव है। भरत द्वारा बताई गई अधिकांश बातें आज भीअक्षरशः सत्य मानी जाती है।
  • भरत ने एक सप्तक के अन्तर्गत 22श्रुतियाँ और 7 शुद्ध स्वर माने है। प्रत्येक स्वर को उसकी अंतिम श्रुति पर स्थापित किया है। सातों स्वर की श्रुतियाँ क्रमशः इस प्रकार है- 4,3,2,4,4,3,2। आज भी लगभग 15 सौ वर्षों के बाद स्वरों की इतनी ही श्रुतियाँ मानी जाती है।भरत ने केवल दो विकृत स्वर माने – अन्तर गंधार और काकली निषाद। भरत के नौ स्वर श्रुति पर इस प्रकार स्थापित हुये- दूसरी पर काकली निषाद, 4थी पर षडज, 7वी पर ऋषभ, 9 वी पर गंधार,11वी पर अन्तर गंधार, 13 वी पर मध्यम,17वी पर पंचम,20वी पर धैवत और 22वी श्रुति पर निषाद स्वर स्थापित किया। भरत ने संवाद भाव पर बहुत बल दिया है। 9 अथवा 13श्रुति पर संवादी और 2श्रुति पर विवादी स्वर का स्थान माना है।
  • भरत ने मध्यम को आवश्यक स्वर माना है और उसे ‘अविलोपी स्वर’ कहा है। सप्तक का कोई भी स्वर जाति में वर्ज्य हो सकता है, किन्तु मध्यम कभी नहीं। भरत ने षडज और मध्यम ग्राम की विशेष रूप से व्याख्या की है, किन्तु गंधार ग्राम को बिल्कुल छोड़ दिया है। इसके लिये उसने लिखा है कि गंधर्व लोगों के साथ वह भी लोप हो गया है। उसने षडज और मध्यम ग्राम में 18 जातियों की रचना स्वीकार की है और नाट्य शास्त्र में जातियों की विस्तृत विवेचना की है। षडज ग्राम से 7 और मध्यम ग्राम से 11 जातियों की रचना मानते हुए जाति के 10 लक्षण बताये है- ग्रह, अंश,न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व, औडवत्व, मंद्र और तार।
  • स्वर, श्रुति, ग्राम, मूर्छना, जाति और उसके लक्षण, वाद्यो के चार प्रकार, आदि का वर्णन 28वे अध्याय में, जातियों का रसानुकूल प्रयोग, विभिन्न प्रकार की वीणा, उनकी वादन विधि, सारणां चतुष्टयी का प्रयोग वर्णन 29 वे अध्याय में, सुषिर वाद्यो का वर्णन 30 वे अध्याय में, कला, लय और विभिन्न तालों का वर्णन 31 वे अध्याय में, ध्रुवा और उसके भेंद, छन्द गायक-वादक के गुण आदि की व्याख्या 32 वे अध्याय में, और अवनद्ध वाद्यो का वर्णन, उसके प्रकार, उत्पत्ति, वादन विधि आदि का वर्णन 33वे अध्याय में दिया गया है। इसके अतिरिक्त पिछले अध्यायो में रस भाव की व्याख्या और इनका स्वर से संबंध बताया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ संगीत का आधार ग्रन्थ सिद्ध होता है।

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