Description of Indian Tandav Dance and types of dance in hindi

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ताण्डव नृत्य

                         “ वीर रसे-महोत्सहो पुरूषो यत्र नृत्यति।

                       रौद्र भाव रसो पत्तिस्त ताण्डव मिति स्मृतं।।”

एक पौराणिक कथा के अनुसार त्रिपुरासुर राक्षस का वध करने पर भगवान शंकर ने वीर और रौद्र प्रधान जो नृत्य किया था उसे ही ताण्डव कहते है। अत: स्पष्ट है कि ताण्डव नृत्य वीर रस प्रधान और पुरूषों के लिए उपयुक्त है, क्योकि इसमे ऐसे अंगहारों का प्रदर्शन किया जाता है जो स्त्रियों के लिए उपयुक्त नही है । इस नृत्य मे तैयारी का  महत्व है । पद और अंग संचालन की गति बहुत तेज होती है । अंगो की चपलता से वीर, क्रोध तथा रौद्र रस-प्रदर्शन के लिए बहुत उपयुक्त नृत्य-शैली है । नृत्य के समय क्रोध की ज्वाला भभकने लगती है, धरती कापती सी प्रतित होती है और ऐसा लगता है मानो संपूर्ण विश्व मे संहार हो रहा हो । अत: ऐसा अभिनय सुकोमल स्त्रियो के लिए कैसै शोभा दे सकती है? स्त्रियों के लिए लास्य नृत्य माना गया है जिसका वर्णन हम आगे करेंगे । ताण्डव न‌त्य मे विश्व की पाँच स्थितियाँ- सृष्टि, स्थिति, तिरोभाव, अविभार्व और संहार दिखाई जाती है । नृत्य के अन्त में आसुरी प्रवित्तियों पर विजय के आनंद से नृत्य समाप्त हो जाता है । ताण्डव नृत्य का विशद विवरण भरत कृत ‘नाट्य शास्त्र’ मे दिया गया है ।

 ताण्डव नृत्य की वेश-भूषा

सिर पर जटा और गंगा की धारा, जटा के ऊपर दूज का चंद्रमा, गर्दन और हाथ मे सर्प लपेटे हुए, कानो मे कुण्डल, गले में रूद्राक्ष की माला, माथे पर तीसरा नेत्र, बदन में भभूत, कमर मे मृग छाला, एक हाथ मे डमरू और दूसरे हाथ में त्रिशुल, इस प्रकार कि वेश भूषा मे तण्डव नृत्य किया जाता है

मुद्रायें

इस नृत्य में अंगो की तोड़-मरोड़, विशेषत:कटि(कमर) की, बहुत महत्व रखती है । इसके चार प्रकार होते हैं- (1) अभंग, (2) समभंग, (3) त्रिभंग, (4) अतिभंग

अभंग- इसमें साधारण तोड़-मरोड़ किया जाता है ‌।

समभंग- इसमें बराबर का तोड़-मरोड़ किया जाता है ।

त्रिभंग- इसमे तिरछे प्रकार के तोड़ मरोड़ का अभिनय किया जाता है ।

अतिभंग- इसमे कठिन मरोड़ का अभिनय किया जाता है

वाद्य

इस नृत्य मे अधिकतर डमरू, नौबत, शंख, घड़ियाल, झाझ, मृदंग, धौंसा, आदि वाद्य बजाये जाता है । अंगो के जोरदार चलन और विभिन्न वाद्यो का यथा-समय प्रयोग रौद्र-रस के संचार मे सहायक होता है । ऐसा मालूम पड़ने लगता है कि जैसे संसार का संहार हो, रहा हो पता नही क्या होने वाला है । स्थितियों के अनुकूल वाद्यों का प्रयोग होता है ।

तण्डव नृत्य के प्रकार

  • संहार ताण्डव– जब संसार मे पाप अधिक हो जाता है, तो जगत का नाश करने के लिए भगवान शंकर जो नृत्य करते हैं । उसे संहार ताण्डव नृत्य कहते हैं ।
  • त्रिपुर ताण्डव- त्रिपुरासुर राक्षस को मारने के बाद शंकर जी ने जो ताण्डव किया उसे त्रिपुर ताण्डव कहते हैं ।
  • कालिका ताण्डव- कालिका ताण्डव नृत्य मे इस भावना का अभिनय दिखाया जाता है, कि आत्मा किस प्रकार संसार के चक्र मे फंसकर दु:खी होती है और किस प्रकार अनेक योनियों मे घूमते हुए विश्व के अनेक बन्धनों से मुक्त होती है ।
  • संध्या ताण्डव- यह नृत्य करूण रस से प्रारम्भ होता है और रौद्र रस पर समाप्त होता है ।
  • गौरी ताण्डव- इस नृत्य मे यह प्रदर्शीत किया जाता है, कि भगवान शंकर देवी गौरी से किस प्रकार प्रेम करते हैं ।

ताण्डव नृत्य मे धत्तिक, धिगिन, धलाँग, धाक्ड़, धान, धलधल, थुंग, धेत्रा आदि जोर दार बोलों का अधिक प्रयोग होता है ।

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