Description of Indian Dance and types of dance in hindi

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नृत्य और उसके प्रकार

 गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते: ।

 नृत्य वाद्यानुगं प्रोक्तं वाद्य गीतानुवर्तिच:।।

नृत्य मन के उल्लास को प्रकट करने का एक सहज, स्वभाविक, और उत्कृष्ट साधन है । बच्चा जब प्रसन्न‌ होता है तो वह स्वत: हाथ-पैर इधर-उधर हिलाकर नाचने लगता है । और वह प्रसन्न उस समय होता हैक् जब उसे अपने मन की चीज प्राप्त हो जाती है । इसी प्रकार आदि मानव को अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार के पीछे काफी दौड़ने के बाद जब  उसका शिकार प्राप्त हो जाता तो वह आंनदमग्न होता और खुशी से नाचने लगता, अत: आंनद की अभिव्यक्ति नृत्य को जन्म देती है । ध्यान रहे केवल हाथ-पांव चलाने और मटकने से नृत्यकला नही होती है । उसे सुन्दरता और नियमबध्द करने पर ही नृत्य कला का रूप लेती है । इसलिये उपयोगी कलाएं अनेक हो सकती हैं, किन्तु ललित कलाएं पाँच मानी गई हैं – स्थापत्य कला , मूर्तीकला , चित्रकला, काव्यकला और संगीत कला । संगीत कला के तीन अंग माने गए हैं – गायन, वादन तथा नृत्य । गायन के आधीन वादन और गायन-वादन के आधीन नृत्य माना गया है । जब नृत्य के साथ गायन – वादन दोनो होता है तो नृत्य की सुन्दरता बढ़ जाती है।

मोटे तौर से जो नृत्य नियमबध्द नही होता उसे लोक नृत्य कहते हैं । आदि मानव प्रकृती के गोद मे रहते हुए , प्रकृति का आंनद लेते हुए  तथा प्रकृति से प्रेरणा और शिक्षा लेते हुए जीवन- यापन करता था । बिजली की चमक और बादलों की गड़गड़ाहट , घनघोर वर्षा और उसका झरना मे बदलना, मोर का नाचना आदि प्राकृतिक मनोहरी दृश्यों ने उसे आंनदमग्न होकर नृत्य करने के लिए प्रेरित किया । फलस्वरूप लोकनृत्य का जन्म हुआ । इससे उसे आत्म सुख का अनुभव हुआ । धीरे -धीरे अनेक लोक नृत्यों का स्वत: निर्माण हुआ जो लोक जीवन के अभिन्न अंग बन गये । इस प्रकार नृत्य के दो मुख्य प्रकार हुए ,(1) शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य । शस्त्रीय नृत्य नियमबध्द होता है तो लोक नृत्य  लोक जीवन पर आधारित मनोरंजनार्थ होता है । भरतनाट्यम, कथकलि, मणिपुरी, कथक, ओड़ीसी,  आदि शास्त्रीय नृत्य तो भांगड़ा, गिध्द, शिकारी, गरबा, गरबी, रास, कोली, छपेली, कबुई, आदि नृत्य लोक नृत्य कहलाते हैं । भारत के विशाल भूभाग में अनेको प्रकार के लोक नृत्य और उसके साथ लोक गीत और लोक वाद्य प्रचलित है आगे कुछ का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है ।

भारतिय मान्यता है ,कि नृत्य की उत्पत्ति भगवान शंकर से हुई । उन्होने ही नृत्य की विभिन्न मुद्राओं का आविषकार किया और तण्डु मुनि को नृत्य की शिक्षा दी । भरत के पुत्रों ने इस जगत मे नृत्य का प्रचर किया । शिव का यह नृत्य तांडव नृत्य कहलाया । भरत लिखित पुस्तक ‘नाट्य शास्त्र’ मे इस नृत्य का विस्तृत वर्णन दिया गया है । देवी पर्वती ने लास्य नृत्य की रचना की । इस नृत्य का वर्णन शारंगदेव लिखित ‘संगीत रत्नाकर’ मे मिलता है । ताण्डव नृत्य पुरूष प्रधान तथा लास्य नृत्य स्त्री प्रधान नृत्य है । भारत के प्रत्येक नृत्य शैली में ताण्डव और लास्य की छाया दिखाई पड़ती है ।

नृत्य के प्रकार / Types of Dance – 

 

 (1) ताण्डव नृत्य 

(2) लास्य नृत्य 

(3) भरतनाट्यम्

(4) कथकलि

(5) मणिपुरी नृत्य

(6) कथक नृत्य

(7) लोक नृत्य

(8) गरबा न‌त्य

(9) गरबी नृत्य

(10) भाँगड़ा नृत्य

(11) शिकारी नृत्य

(12) छपेली नृत्य

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