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Classification of Ragas- Anicent, Medieval and Modern in hindi Music theory

Classification of Ragas- Anicent, Medieval and Modern in hindi Music theory

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Classification of Ragas

राग वर्गीकरण

संगीत में भी वर्गीकरण हुआ। रागो को विभिन्न तरीक़े से बाँटने की परम्परा प्राचीन काल से आज तक चली आ रही है। वर्गीकरण के इतिहास को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। नींचे इन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला जा रहा है-

Anicent time raag classification

प्राचीन काल

  • जाति वर्गीकरणपीछे हम बता चुके हैं कि प्राचीन काल में कुल तीन ग्राम- षडज,मध्यम और गंधार माने जाते थे और गंधार प्राचीन काल से ही लुप्त हो चुका था।
  • भरत कृत नाट्य शास्त्र में यह वर्णन है कि शेष दो ग्रामों अर्थात षडज और मध्यम ग्रामों से 18 जातियां उत्पन्न हुई,षडज ग्राम से 8 और मध्यम ग्राम से 11 । इन 18 जातियों को ‘शुद्ध और विकृत’ भागों में बाँटा गया। इनके 7 शुद्ध और11विकृत मानी गई।
  • षडज ग्राम की चार जातियां- षाडजी, आर्षभी,धैवती और नेषादी अथवा निषादवती और मध्यम ग्राम की तीन जातियां – गंधारी, मध्यमा और पंचम शुद्ध मानी गई। ये नाम सातों शुद्ध स्वर के आधार पर रखें गयें है।
  • शेष 11 जातियाँ 3 षडज की और 8 मध्यम की विकृत मानी गई है। इस प्रकार कुल 18 जातियाँ हुई। शुद्ध जातियां वो थी जिनमें सातों स्वर प्रयोग किये जाते थे और जिनका नामकरण सातों शुद्ध स्वर के आधार पर हुआ था,जैसे षाडजी, आर्षभी, मध्यमा, गंधारी,पंचम धैवती आदि। इनमे नाम स्वर ही ग्रह, अंश और न्यास होते हैं।
  • शुद्ध जातियों के लक्षण में परिवर्तन करने से जैसे न्यास, अपन्यास,ग्रह व अंश स्वर बदल देने से अथवा एक या दो स्वर वर्ज्य कर देने से तथा दो या दो से अधिक जातियों को एक में मिला देने से विकृत जातियों की रचना होती थी- जैसे षाडजी और गंधारी को मिला देने से षडजकैशिकी, गंधारी और आर्षभी को मिला देने से आंध्री विकृत जाति बनती थी इत्यादि इत्यादि।
  • जाति और राग एक दूसरे के पर्यावाची शब्द कहे जा सकते है।जिस प्रकार आजकल राग गायन प्रचलित है उसी प्रकार प्राचीन काल में जाति गायन प्रचलित था। स्वर और वर्ण युक्त रचना को जाति कहते थे। यही परिभाषा राग की भी है।
  • भरतकाल में जाति के दस लक्षण माने जाते थे- ग्रह, अंश, न्यास,अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व,औडव,षाडवत्व, मन्द्र और तार।इसे भरत ने’दस विधि जाति लक्षणम’ कहा है।
  • ग्राम से मूर्छना और मूर्छना के आधार पर जातियों की रचना हुई। ‘संगीत रत्नाकर’ में जाति के 13 लक्षण माने गए हैं और भरत की 10 जाति लक्षण को मानते हुए सन्यास, विन्यास और अर्न्तमार्ग, ये तीन लक्षण पं० शारंगदेव ने जोड दिये हैं।
    • ग्राम राग वर्गीकरणजाति राग वर्गीकरण के पश्चात ग्राम राग का जन्म हुआ। सर्वप्रथम मतंग मुनि द्वारा लिखित वृहद्देशी में ग्राम राग शब्द का प्रयोग किया गया है।
  • प्राचीन काल में ग्राम राग भी जाति अथवा राग के समान सुन्दर और गेय रचनाएँ होती थी। प्राचीन ग्रन्थों में30 ग्राम राग मिलते हैं अर्थात 18 जातियों से कुल 30 ग्राम राग उत्पन्न माने गए हैं। पीछे हम बता चुके हैं कि षडज और मध्यम ग्रामों की मुर्छना से जाति और जाति से ग्राम राग उत्पन्न माने गये है। इन ग्राम रागों को शुद्ध, भिन्न, गौड,बेसर तथा साधारण इन 5 गीतियो में विभाजित किया गया है
  • शुद्ध7, भिन्न5, गौड3, बेसर8 और साधारण रिति से 7 ग्राम राग थे। ग्राम राग ही आगे चलकर आधुनिक रागों में विकसित हुए।
    • दस विधि राग वर्गीकरण13 वी शताब्दी में पं० शारंगदेव द्वारा लिखित ‘ संगीत रत्नाकर’ में सम्स्त रागों को दस भागों में विभाजित किया गया है। उनके नाम है- ग्राम राग, राग, उपराग,भाषा, विभाषा, अन्तर्भाषा,रागांग, भाषांग, उपांग और क्रियांग। इनमें प्रथम 6 वर्ग मार्गी संगीत अथवा गांधर्व संगीत के अन्तर्गत आते है और अंतिम चार देशी संगीत अथवा गान के अन्तर्गत आते है। वास्तव में इनकी व्याख्या किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलती।
    • शुद्ध, छायालग और संकीर्ण वर्गीकरणप्राचीन काल में रागों को शुद्ध, छायालग और संकीर्ण वर्गो में विभाजित करने की विधि भी प्रचलित थी किन्तु आज इनका स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता।

  ऐसा कहा जाता हैं कि जो राग स्वतंत्र होते है और जिनमें किसी भी राग की छाया नहीं होती शुद्ध राग वे शुद्ध राग और जिनमें किसी एक राग की छाया आती है उसे छायालग राग तथा जिनमें एक से अधिक रागों की छाया आती हैं वे संकीर्ण राग कहलाते है।

                                     इस दृष्टि से कल्याण, मुलतानी, तोड़ी आदि शुद्ध राग छायानट, तिलक कामोद, परज छायालग राग और पीलू, भैरवी आदि संकीर्ण राग कहे जा सकते है।

Medieval time raag classification

  मध्य काल-

  • शुद्ध, छायालग और संकीर्ण रागमध्य काल में भी यह विभाजन प्रचलित रहा और इनके अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इतना अवश्य है कि इसके समर्थक दिन पर दिन कम होते गये।
  • मेल राग वर्गीकरणमेल को आधुनिक थाट का पर्यावाची कहा जा सकता है। जिस.प्रकार से आधुनिक काल में थाट- राग प्रचलित हैं उसी प्रकार से मध्य काल में मेल राग प्रचलित था।
  • मेलों की संख्या में अनेक मत थे। कुछ ने बारह, कुछ ने उन्नीस और व्यंकटमूखी ने 72 मेल सिद्ध किये। आज भी कर्नाटक पद्धति में मेल शब्द प्रचलित हैं।
  • जिस प्रकार यहाँ दस थाट माने जाते है उसी प्रकार कर्नाटक में 19 मेल माने जाते है।
  • मध्यकालीन राग वर्गीकरण प्राचीन मूर्छना वर्गीकरण का विकसित रूप था।
  • लोचन ने ‘राग तरंगिणी’ में केवल 12 मेल माना इसी प्रकार ‘राग विवोध’ में 23, स्वर मेल कलानिधि में 27 और चतुर्दन्डिप्रकाशिका में मेलो की संख्या 19 मानी गई।
  • रागरागिनी वर्गीकरण मध्य काल की यह विशेषता है कि कुछ रागों को स्त्री और कुछ रागों को पुरूष मानकर रागों की वंश परम्परा मानी गई। इसी विचारधारा के आधार पर राग- रागिनी पद्धति का जन्म हुआ। इसमें मत्येक ना रहा और मुख्य चार मत हो गये। प्रथम दो मतानुसार प्रत्येक राग की 6,6 और अंतिम दो मतानुसार 5,5 रागिनियाँ मानी जाती थी। इन रागों के 8-8 पुत्र चारों मतो द्वारा मान्य थे। इस प्रकार प्रथम दो मतानुसार 6 राग व 36 रागिनियाँ और अंतिम दो मतानुसार 6 राग 30 रागिनियाँ मानी जाती थी। चारों मतों का विवरण इस प्रकार है-
    • शिव अथवा सोमेश्वर मत इस मतानुसार छ: राग -श्री, बसंत, पंचम,भैरव, मेघ व नट नारायण माने जाते थे और प्रत्येक राग की 6-6 रागिनियाँ मानी जाती थी। उसके बाद पुत्र वधुएँ भी मानी गई।

(ब) कृष्ण अथवा कल्लिनाथ मतइस मत के 6 राग प्रथम मत के ही समान थे किन्तु उनकी 6 रागिनियाँ उनके पुत्र और पुत्र वधुएं शिव मत से भिन्न थी।

(स)भरत मतइस मतानुसार भैरव, मालकंश,हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ राग,प्रत्येक की 5-5 रागिनियाँ 8-8 पुत्र और पुत्र वधुएँ भी मानी गई।

(द) हनुमान मतइसके 6 राग भरत मत के समान थे। प्रत्येक की 5-5 रागिनियाँ और 8-8 पुत्र माने गए  जो भरत से भिन्न थे।

राग रागिनी पद्धति की आलोचना

  • किसी को राग, किसी को रागिनी और किसी को पुत्र मानने का कोई आधार नहीं था। अपनी अपनी कल्पना और इच्छा अनुसार किसी को राग ,किसी को रागिनी और किसी को पुत्र माना।
  • किस आधार पर मुख्य राग माने गये तथी संख्या 6 ही क्यों मानी गई, न कम न ज्यादा।
  • प्रत्येक राग की 6-6 और 5-5 रागिनियाँ ही क्यों मानी गई कम और ज्यादा क्यों नहीं।
  • अगर 6 रागिनियाँ मानी भी गई तो कुछ विशिष्ट रागिनियाँ किसी अमुक राग की ही क्यों मानी गई जैसे उदाहरण के लिए हनुमान मत के अनुसार भैरव की रागिनियाँ भैरवी, वैरारि,मधुमाधवी ही क्यों मानी गई? अन्य नहीं इस प्रकार अनेक कमियाँ सामने आई जिनका उचित जवाब नहीं मिलता।
  • पुत्र- रागों की वधुएँ तो मान ली गई किन्तु वधुएँ के वंश का अता- पता नहीं मिलता।

Modern time raag classification

आधुनिक काल-

  • शुद्ध, छायालग और संकीर्णआधुनिक काल में यह विभाजन मात्र नाम के लिए शेष है। कभी कभार इसका प्रयोग दिखाई पडता है।
  • रागरागिनी वर्गीकरणकुछ पुराने संगीतज्ञ इसी विभाजन को मान्यता देते है, किन्तु यह वर्गीकरण समय के साथ तेजी से कम होती जा रही हैं।
  • रागांग वर्गीकरणकुछ दिनों पूर्व बम्बई के  स्व० नारायण मोरेश्वर खरे ने 30 रागांगो के अन्तर्गत सभी रागों को विभाजित किया। सम्स्त रागों का सूक्ष्म निरीक्षण करने के बाद उन्होंने 30 स्वर समुदाय चुनें,जैसे ग,म,रे,सा आदि।
  • ये स्वर जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध थे,उसी राग नाम से उसे रागांग पुकारा जैसे पहले स्वर समुदाय को बिलावल और दूसरे को भैरवी रागांग की संज्ञा दी।
  • इसी वर्गीकरण मे स्वर साम्य की तुलना में स्वरूप साम्य में सबसे अधिक ध्यान रखा गया। रागांगो की संख्या अधिक और वर्गीकरण कुछ जटिल होने के कारण यह प्रचार में नहीं आ सका।
  • तीस रागांगो में कुछ इस प्रकार है- भैरवी,भैरव, बिलावल, कल्याण,खमाज, काफी, पूर्वी,मारवा, तोड़ी, कान्हडा,मल्हार, सारंग,बागेश्री,ललित, आसावरी,भीमपलासी, पीलू, कामोद आदि।
  • थाट वर्गीकरणहम बता चुके है कि मध्यकाल में मेल राग प्रचलित था और थाट का पर्यावाची है अर्थात दोनों का अर्थ एक ही है।
  • मध्यकालीन मेलों की संख्या और नाम के विषय में विभिन्न मत मतांतर होने के कारण यह पद्धति अच्छी होते हुए भी छोड़ दी गई। आधुनिक काल में यह पद्धति थाट-राग वर्गीकरण के नाम से प्रचार में आई जिसका मुख्य श्रेय स्व० भातखंडे जी को है। उन्होंने सम्स्त रागों को दस थाटो में विभाजित किया जिनके नाम है- बिलावल, खमाज, कल्याण, काफी, भैरव, आसावरी, भैरवी,पूर्वी,मारवा और तोड़ी।
  • बिलावल थाट में सभी शुद्ध स्वर ,कल्याण में तीव्र मध्यम और शेष स्वर शुद्ध,काफी में ग और नि कोमल, आसावरी में ग,ध,नि कोमल, भैरव में रे व ध कोमल,पूर्वी में रे,ध कोमल और म तीव्र, मारवा में रे कोमल और मध्यम तीव्र तथा तोड़ी मे रे,ग,ध, कोई और म तीव्र और अन्य स्वर शुद्ध माने गये है।
  • उत्तर भारत में थाट-राग वर्गीकरण की ही मान्यता है। इसमें स्वर साम्य की तुलना में स्वरूप साम्य को अधिक ध्यान में रखा गया है। उदाहरण के लिए भूपाली को कल्याण थाट के अन्तर्गत और देशकार को बिलावल थाट के अन्तर्गत रखा गया है, जबकि दोनों के स्वर एक ही है।
  • इसी प्रकार वृन्दावनी सारंग को स्वरूप साम्य के आधार पर काफी थाट का राग माना गया है जबकि स्वर की स्वर की दृष्टि से इसे खमाज थाट का राग माना जाना चाहिए।
  • थाट से राग उत्पन्न माने गए हैं इसलिए थाट को जनक थाट और राग को जन्यराग और थाट-राग वर्गीकरण की जनकजन्य पद्धति कहा गया है।
  • प्राचीन काल से आज तक जितने भी राग विभाजन हो चुके है उनमें थाट – राग वर्गीकरण आधुनिक काल के लिए सर्वोत्तम है,लेकिन फिर भी इसमें सुधार की आवश्यकता है।
  • राग ललित, पटदीप,मधुवन्ती आदि राग किसी भी थाट के अन्तर्गत नहीं आते। ललित को जबरदस्ती मारवा थाट का राग कहा गया है। इसी प्रकार चन्द्रकोश,भैरव बहार,अहिर भैरव.आदि रागों के साथ भी न्याय नहीं किया गया। मिश्रित रागों के थाट वर्गीकरण में काफी परेशानी होती हैं। राग अहिर भैरव में राग भैरव और काफी का मिश्रण है। इन दोनों रागों के थाट अलग अलग है। ठीक इसी प्रकार की कठिनाई भैरव बहार के थाट निर्धारण में आती है। इसलिए सुझाव यह है कि अगर थाटो की संख्या बढा.दी जाये तो इस.प्रकार की दिक्कत में अवश्य कमी  होंगी।

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