Detail study of Sangeet Markand I Sangeet Parijaat & Sangeet Ratnakar in hindi

Brief study of Sangeet Markand I in Indian classical music  in hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Detail study of Sangeet Parijaat & Sangeet Ratnakar

Sangeet parijaat / संगीत पारिजात

 

  • यह ग्रंथ पंडित अहोबल द्वारा सन् 1650 में लिखा गया है यह अपने काल का प्रतिनिधि ग्रन्थ माना जाता है क्योंकि यह कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इनके बाद के ग्रन्थाकारों में पं० अहोबल की छाया दिखती हैं। अहोबल ही प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने संगीत पारिजात में वीणा पर स्वरों का स्थान निश्चित करने के लिए एक नवीन पद्धति अपनाई। इस पद्धति के द्वारा साधारण व्यक्ति भी स्वर की स्थापना सही ढंग से कर सकता है।
  • यह ग्रंथ मंगलाचरण से प्रारंभ होता है। इसके बाद स्वर, ग्राम, मुर्छना, स्वर-विस्तार, वर्ण, जाति , समय और राग प्रकरण( अध्याय) में संगीत के पारिभाषिक शब्दों और अन्य बातों पर विचार किया गया है।
  • स्वर प्रकरण के अन्तर्गत अहोबल ने बताया है कि ह्दय स्थित अनाहत चक्र में वायु और अग्रि के संयोग से आहत नाद की उत्पत्ति होती है। आगे उन्होंने बताया है कि नाद दो प्रकार के होते हैं आहत नाद और अनाहत नाद। स्वर और श्रुति में सर्प और उसकी कुण्डली सा भेंद है। परम्परा का पालन करते हुए श्रुति की संख्या और उनके नाम बताया। उसने बाईस श्रुतियों को पांच भेदों में बाटा- दीप्ता, आयता, करूणा, मृदु और मध्या। सा- म को ब्राह्मण , रे- ध को क्षत्रिय, और ग- नि वैश्य कहा। आगे उन्होंने स्वरों की जन्म भूमि, उनके रंग और रस बताया। ग्राम प्रकरण के अन्तर्गत उसने षडज, मध्यम और गंधार इन तीनों ग्रामों के स्वरूप का वर्णन किया है।
  • मूर्छना प्रकरण के अन्तर्गत्त मूर्च्छना की परिभाषा देते हुये उसने केवल षडज ग्राम की मूर्छनाओं का वर्णन किया है। मध्यम और गंधार ग्राम की मूर्छनाओं को बिल्कुल छोड़ दिया है। शुद्ध स्वरों से सात मूर्छनाएं बन सकती है, किन्तु उसने विकृत स्वरों से भी सम्पूर्ण जाति की मूर्छनाओं की रचना की है। इसके बाद से उसने षडज ग्राम की शुद्ध और विकृत स्वरों की मूर्छनाओं की रचना की। इन सब को मिला देने से उसने बताया की केवल षडज ग्राम से 4 लाख, 20 हजार, 1 सौ  20 मूर्छनाओं की रचना हो सकती है।
  • स्वर प्रस्तार प्रकरण के अन्तर्गत उसने सातों स्वर के संयोग से 4 हजार 2 सौ 20 स्वर समूह की रचना को बताया है। वर्णलक्षणम अध्याय के अन्तर्गत वर्ण की परिभाषा बताते हुए वर्ण के चार प्रकार बताये है- स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी। अलंकार की परिभाषा इस प्रकार दी है ‘ क्र स्वरसंदर्भमलकारं प्रचक्षते’। अलंकार के कई प्रकार बताये है जैसे- मृदु, नन्द, विस्तीर्ण, जित, सोम, बिन्दु,ग्रीव, भाल, वेणी, प्रकाशक आदि। स्थाई वर्ण के 7, आरोही वर्ण के 12, अवरोही वर्ण के भी 12, सचारी के वर्ण 25 कुल मिलाकर 56अलंकार बताये है। इनके अतिरिक्त पं० अहोबल ने 5 अलंकार और बताये है। इन सभी अलंकार के नाम, लक्षण, और उदाहरण संगीत पारिजात में दिये गए हैं। मंद्र सप्तक के लिये ऊपर बिन्दु और तार सप्तक के लिये खडी रेखा अंकित किया है।
  • गमक प्रकरण में 7 शुद्ध जातियांद्यषडजा, आर्षभी, गंधारी, मध्यमा, पंचमी, धैवती और निषादी का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, कंपित, प्रत्याहत, स्फुरित, घर्षण,हुम्फित आदि गमको को समझाया गया है।
  • समय प्रकरण के अन्तर्गत वीणा पर स्वरों की स्थापना बताई गई है। 5 प्रकार गीतिया मानी है और उनके लक्षण दिये गये है। आगे 1 सौ 25 रागों का गायन समय और परिचय बताया गया है। अहोबल ने आगे स्पष्ट रूप से लिखा है राग तो बहुत से माने गये है किन्तु 125 उपयोगी रागों का वर्णन किया गया है। संगीत पारिजात में कुल 500 श्लोक है।

Sangeet ratnakar / संगीत रत्नाकर

 

    • यह ग्रंथ 13वी शताब्दी के उतरार्ध में पं० शारंगदेव द्वारा लिखा गया। यह देवगिरि ( दौलताबाद) राज्य का संगीतज्ञ था। यह ग्रंथ उत्तरी और दक्षिणी दोनों संगीत पद्धतियों में आधार ग्रन्थ माना जाता है। संगीत रत्नाकर सात अध्यायों में विभाजित है जिनमें गायन, वादन और नृत्य तीनों से संबंधित पारिभाषिक शब्दों तथा अन्य बातों पर प्रकाश डाला गया है।यद्यपि उसने भरत का अनुशरण किया है फिर भी उसकी मौलिकता और सारणां चतुष्टयी, मूर्छना मध्यम ग्राम का लोप, अनेक विकृत स्वरों की प्राप्ति में झलकता है।
    • संगीत रत्नाकर के प्रथम अध्याय- स्वराअध्याय में नाद की परिभाषा ,नाद की उत्पत्ति और उसके भेंद( आहत और अनाहत), सारणां चतुष्टयी, ग्राम, मूर्छना, वर्ण, अलंकार और जाति का विस्तृत वर्णन मिलता है। सारणां चतुष्टयी प्रयोग के अन्तर्गत भरत ने स्वर वीणा और शारंगदेव ने श्रुति वीणा पर प्रयोग किया है। इसलिये भरत ने सात तार और पं० शारंगदेव ने 29 तार बांधे थे। मूर्छना के अन्तर्गत उसने सभी मूर्छनाओं को षडज ग्राम में खिसका दिया और प्रत्येक मूर्छना को षडज ग्राम से प्रारंभ किया। जिससे उसे विकृत स्वर की परख हुई। उसके समय तक केवल दो ही विकृत स्वर माने जाते थे । उसके स्वरों की विशेषता यह थी कि कोई भी स्वर अपने स्थान से हट जाने पर विकृत तो होता ही था, अपने स्थान पर रहते हुये भी पिछले स्वर से अन्तराल(श्रुत्यांतर) बदल जाने पर भी विकृत हो जाता था।
    • संगीत रत्नाकर का दूसरा अध्याय राग विवेकाध्याय है। इसके अन्तर्गत उसने 264 रागों का वर्णन किया है। उसने सभी रागों को 10 भागों में बाटा है जिनके नाम है-(1) ग्राम राग जिनकी संख्या 30 मानी है(2) राग की 20, (3) उपराग की 8,(4) रागांग की भी 8,(5) भाषांग की 21,(6) क्रियांग की 12,(7)उपांग की 3,(8) भाषा की 6,(9) विभाषा की 20,(10) अन्तर्भाषा की 4 मानी है। इस वर्गीकरण का आधार अस्पष्ट होने के कारण इनके अर्थ के विषय में कई मतमतान्तर है। फिर भी इस वर्गीकरण से यह स्पष्ट है कि उस समय भरत की जातियां अप्रचलित हो गई थी।
    • तीसरा अध्याय प्रकीर्णकाध्याय है, जिसमें उसने वाग्गयेकार के 28 गुणों का विवेचन किया है। इसके अतिरिक्त गायक के गुण दोष, अच्छाई और बुराई  बताई है।
    • चौथा अध्याय प्रबंधाध्याय है, जिसमें शारंगदेव ने प्रबंध विषय पर विचार किया है। देशी संगीत, मार्गी संगीत, निबद्धगान, अनिबद्धगान, रागालाप, रूपकालाप, आलप्तिगान, स्वस्थान नियम का आलाप, अल्पत्व, बहुत्व आदि पर इस अध्याय में प्रकाश डाला है।
    • पंचम अध्याय तालाध्याय है, जिसमें उसने उस समय में प्रचलित तालो का विचार किया है। छठा अध्याय वाद्याध्याय है, जिसमें उसने समस्त वाद्यो को चार भागों में बाटा है- तत्, सुषिर, अवनद्ध और घन । संगीत रत्नाकर का अन्तिम अध्याय नर्तनाध्याय है जिसमें उसने नृत्य, नाट्य, और नृत्य संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला है।

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Sangeet Markand / संगीत मकरंद

 

  • आठवीं शताब्दी के लगभग यह ग्रंथ लिखा गया।इसके रचयिता नारद है। नारदीय शिक्षा भी इन्हीं की कृति है। संगीत मकरंद में रागों को चार दृष्टिकोण से विभाजित किया गया है- कम्पन, जाति, समय और प्रकार। कम्पन की दृष्टि से दो प्रकार के राग है- मुक्तांक कम्पन और कम्पनविहिन। जाति की दृष्टि से रागों के तीन वर्ग है – औडव,षाडव और सम्पूर्ण। गायन समय की दृष्टि से तीन विभाग है- प्रातर्गेय, मध्याह्गेय और रात्रिगेय। प्रकार दृष्टि से रागों को स्त्री, पुरूष और नपुंसक वर्गों में बाँटा गया है। यह विभाजन उस समय के लिये बिल्कुल नया था जो सर्वप्रथम बार इसी ग्रन्थ में मिलता है। बाद के ग्रन्थाकारों ने इसी ग्रन्थ के बाद से राग – रागिनी वर्गीकरण मानना शुरू किया है। उसने 20 पुरुष राग, 24 स्त्री राग और 36 नपुंसक राग माने है।
  • नाद की परिभाषा देते हुये उसने नाद के 5 प्रकार स्वीकार किये है- नखज, वायुज, चर्मज, लोहज और शरीरज। यद्यपि श्रुति की संख्या 22 मानी है लेकिन उनके नाम परम्परागत नामों से बिल्कुल भिन्न हैं। उसने 18 प्रकार की वीणा  का वर्णन किया है।

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