faiyaz-khan biography

Biography of Ustad Faiyaz Khan-Jivni in Hindi

Biography of Ustad Faiyaz Khan-Jivni in Hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Ustad Faiyaz Khan-Jivni

 

फैयाज खाँ की जीविनी 

  • उत्तर भारतीय संगीत में घरानों का योगदान बडा सराहनीय रहा है। जब कभी आगरा घराने की चर्चा उठती है तो स्व० उ० फैयाज खाँ का नाम स्मरण बरबस हो जाता है।
  • बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जितना सम्मान फैयाज खाँ को मिला उतना किसी मुसलमान गायक को नहीं मिला।
  • काली शेरवानी और सफेद साफा पहनकर अपने शिष्यों के साथ रंगमंच पर बडी अदा के साथ जब पधारते, तो ऐसा मालूम पडता कोई पहलवान गायक है । हष्टपुष्ट शरीर, बडी बडी मूँछे, दोहरा बदन और लगभग 6 फीट की ऊचाई से वे दूर से ही पहचाने जा सकते थे।
  • स्व० उस्ताद फैयाज खाँ का जन्म सन 1886 में आगरा में हुआ था। इनके जन्म से 3-4 माह पहले ही इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। फैयाज खाँ के पिता का नाम सफदर हुसैन था। फैयाज खाँ के नाना ने इनका पालन पोषण किया और उन्होंने ही फैयाज खाँ को संगीत की शिक्षा दी।
  • फैयाज खाँ किसोर अवस्था से ही अच्छा गाने लगे थे प्रत्येक स्थान पर इनका अच्छा प्रभाव पड़ता। तत्कालीन मैसूर नरेश इनके गायन से बडे प्रभावित हुए । इन्हें सन.1906 मे एक स्वर्ण पदक और सन 1911 में ‘ आफताबे मौशिकी’ सुशोभित किया गया।
  • बडौदा महाराज फैयाज खाँ की गायकी से बहुत प्रभावित हुए और इन्हें अपना राज्य गायक नियुक्त किया।
  • फैयाज खाँ में पितृवंश से रंगीले और मातृवंश से आगरा घराने का योग था। उन्होंने दोनों प्रकार की गायकी का सुन्दर समन्वय अपनी गायकी में किया।
  • खाँ साहब का कंठ नीचा किन्तु भरा, जवारीदार और बुलन्द था। काफी नींचे स्वर से गाते थे और गाते समय अपने मूड का ध्यान रखते थे। बहुत सज धजकर बैठते और हिना का इत्र लगाकर पान की डिब्बी लेकर साथ बैठते थे।
  • खाँ साहब ख्याल, ध्रुपद, धमार, ठुमरी,टप्पा,गजल,कव्वाली आदि सभी के गायन में बडे कुशल थे। ख्याल, ध्रुपद और धमार में अद्वितीय थे,किन्तु मोटी आवाज से ठुमरी के प्रत्येक अंग को इतनी सुन्दरता से प्रस्तुत करते थे कि बडा आश्चर्य होता।
  • उनकी गाई हुई ठुमरी का रिकार्ड बाजूबंद खुल खुल जाये बडा प्रसिद्ध है। ख्याल में भी ध्रुपद ,धमार के समान नोम तोम का आलाप करते थे। बीच बीच में तू ही अनन्त हरि कभी कभी बोलते। विस्तृत आलाप करने.के बाद गीत की बंदिश शुरू करते। उनके स्वर लगाने की रीति आगरा घराने का प्रतिनिधित्व करती है और सुनते ही उस घराने की याद आ जाती है। उनका यह अंग उनके शिष्यों में थोड़ा बहुत मिलता है।
  • फैयाज खाँ की गायकी में बडी रंगत थी। वे बोल बनाव और बोल तान में जो आगरा घराने की विशेषता है, बडे निपुण थे। ऐसे ऐसे स्थान से बोल बनाते हुए सम से मिलाते के सुनने वाले को दाँतों तले उंगली दबानी पडती। बीच बीच में कव्वाली के समान बोल बनाते समय हाँ हाँ भी करते जिससे और रंगत बढ जाती। स्वर, लय और ताल पर उन्हें पूर्ण अधिकार था। कहीं से भी गला घुमा देते और बंदिश से मिल जाते, लेकिन सही स्थान पर पहुचते। जबडे की तानों का प्रयोग करते,किन्तु उनकी ताने सुन्दर, स्पष्ट और तैयार थी। उनका राग ज्ञान बहुत अच्छा था। वे प्रत्येक राग को अलग अलग ढंग से गा सकते थे।
  • फैयाज खाँ एक अच्छे रचनाकार भी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में अपना नाम प्रेमप्रिया रखा था। उन्होंने बहुत सी बंदिशों की भी रचना की। जैजैवन्ती में मोरे मन्दिर अब लौ नही आये तथा राग जोग में आज मोरै घर आये आदि गीतों की भु रिकार्डिंग भी हो चुकी हैं, और ये गीत बहुत लोकप्रिय है। ललित राग में निबद्ध ‘ तडपत हू जैसे जल बिन मीन’ तथा नट बिहाग में झन झन पायल बाजे रेकाँर्डस भी बडे उच्चकोटि के है।
  • बडौदा दरबार में रहते हुए भी वे महाराज की आज्ञा से संगीत सम्मेलनों तथा आकाशवाणी कार्यक्रम में भाग लेने जाते।
  • जैजैवंती, ललित, दरबारी, सुघराई, तोड़ी, रामकली, पूरिया, पूर्वी आदि उनके प्रिय राग थे।
  • उनके प्रमुख शिष्यों में स्व० पं० यस० यन० रातनजनकर, दिलिप चन्द्र बेदी, विलायत हुसैन, लताफत हुसैन, शराफत हुसैन, अजमत हुसैन, अता हुसैन आदि थे।
  • खाँ साहब का देहावसान 5 नवम्बर सन 1950 को बडौदा में हुआ।

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