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Biography of Hassu haddu khan-Jivni in Hindi

Biography of Hassu haddu khan-Jivni in Hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Hassu Haddu khan-Jivni

 

   हस्सू- हददू खाँ की जीविनी 

                             

    • हस्सू- हददू खाँ नामक गायक ग्वालियर घराने के स्तम्भ माने जाते थे। इनमे हस्सू बडे थे और हददू छोटे। ग्वालियर गायकी हस्सू खाँ के समय से प्रसिद्ध हुई और इसका श्रेय प्रतिभावान गायक हस्सू खाँ को मिलता है, इसलिए आज भी प्रत्येक संगीतज्ञ उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते है।
    • आपके पिता का नाम कादिर बख्श और पितामह का नाम नत्थन पीरबख्श था। वे लोग लखनऊ में रहते थे। हस्सू खाँ की बाल्यावस्था में ही उनके पिता कादिर बख्श की मृत्यु हो गई, अतः उनका पालन- पोषण उनके बाबा नत्थन पीरबख्श ने किया, वे लखनऊ छोड़कर ग्वालियर जाकर बस गये, जहाँ ग्वालियर घराने का सूत्रपात हुआ। इस घराने का प्रारम्भ नत्थन पीरबख्श से ही माना जाता है। जिस समय वे लोग ग्वालियर पहुंचे, श्री दौलतराव शिन्दे तत्कालीन ग्वालियर राज्य के शासक थे। वे स्वयं बडे कला प्रेमी थे। उनके दरबार में अनेक संगीतज्ञ थे, जिन्हें राजाश्रय प्राप्त था। उन्होंने नत्थन पीरबख्श और बाद में हस्सू हददू खाँ को राजाश्रय दिया।
    • हस्सू खाँ जितने प्रतिभावान व्यक्ति थे उनका कन्ठ भी उतना मधुर और आकर्षक था, इसलिये दरबार में उनकी बडी प्रतिष्ठा थी और अन्य कलाकारों की अपेक्षा उन्हें अधिक सुविधाये प्राप्त थी। दरबार में मुहम्मद खाँ नामक एक प्रौढ़ गायक थे। वे अपना गायन हस्सू-हददू खाँ को किसी भी कीमत पर नहीं सुनाना चाहते थे, उन्हें भय था कि उनकी गायकी को वे लोग चुरा लेंगे और हुआ भी ऐसा। महाराज की आज्ञा से लगभग वे लोग तीन महीने तक लगातार उनकी गायकी सुनते रहे। यह अवधि प्रतिभावान कलाकारों के लिए कम नहीं थी। उन लोगों ने मुहम्मद खाँ की गायकी से मुख्य बात चुन ली और अपने कण्ठ में ढाल ली। महाराजा को भी पूर्ण विश्वास हो गया कि अब उन्हें मुहम्मद खाँ की गायकी को अधिक सुनाने की आवश्यकता नही रही और इन लोगों ने उनकी गायकी का गायकी का पूरा सार निकाल लिया है।
    • महाराज ने संगीतज्ञों की एक विशेष सभा आयोजित की और राज्य के सभी कलाकारों एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों को निमंत्रित किया। सदा की भातिं मुहम्मद खाँ का गायन हुआ और सभी ने उसकी तारीफ की। उनके बाद उन दोनों भाईयों को गाने के लिए कहा गया। दोनों ने खूब जमकर गाया और अपनी गायन शैली में मुहम्मद खाँ की गायकी का ऐसा समन्वय किया कि उपस्थित श्रोता दांतों तले अंगुली दबाकर रह गये। दरबार में उन दोनों की मान प्रतिष्ठा बढ गई और मुहम्मद खाँ की कम हो गई। फलस्वरूप वह हस्सू- हददू खाँ से मन ही मन जलने लगे और बदला लेने की योजना बनाने लगे।
    • कहते है कि एक दिन फिर से संगीत-सभा आयोजित की गई। सभी संगीतज्ञ एकत्रित हुये। मुहम्मद खाँ बदला लेने की भावना से खाँ बंधुओं की प्रशंसा करते हुए उनसे राग मियाँ मल्हार गाने को कहा। वे बेचारे गाने लगे। वह यह नही जानते थे कि इस फरमाइश में कोई षड़यंत्र छिपा है।
    • कहते है कि मियां मल्हार में एक विशिष्ट प्रकार की तान ली जाती थी जिसे कडक बिजली की तान कहते थे। तान तो क्लिष्ट थी ही, उसे निकालने में कलेजे में बडा जोर पडता था। साधारण व्यक्ति के लिये उसे केवल एक बार निकालना मुश्किल था। हस्सू खाँ बडे हस्ठ पुष्ट युवक थे।उन्होंने बडी कुशलता के साथ एक बार गा दिया। मुहम्मद खाँ तो बदला लेने पर आमादा थे,ही उसने उनकी प्रशंसा करते हुये एक बार और गाने के लिए अनुरोध किया। हस्सू खाँ अपनी तरूणावस्था के जोश में उसे निकालने लगे। कहते है कि जब अवरोह करने लगे तो उनकी पसली चढ गई और मुंह से खून निकल पडा। उस घटना के कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु सन् 1859 के लगभग हो गयी। उनकी मृत्यु से मुहम्मद खाँ के अतिरिक्त सभी लोग बडे दुखी हुये। हददू खाँ अकेले रह गये।उनकी जोड़ी टूट गई। वे विक्षिप्त रहने लगे। कुछ दिनों के बाद हददू खाँ और महाराजा से कुछ अनबन भी हो गई। भाई से बिछडने से और महाराजा से अनबन से वे ग्वालियर छोड़कर लखनऊ में रहने लगे। कुछ दिनों के बाद ग्वालियर नरेश से उन्हें पुनः बुला लिया और तब से वे जीवन पर्यन्त वही रहे।
    • महाराजा ग्वालियर, हददू खाँ से बहुत स्नेह करने लगे और जब कहीं यात्रा में जाते उन्हें अपने साथ ले जाते। यात्रा में उनका गायन होता और वे संगीत का आनंद लेते। महाराज जी की यात्रा के दौरान कलकत्ता और पूना में अनेक संगीत कार्यक्रम हुये और हददू खाँ को बडी प्रशंसा मिली। राग ललित, तोड़ी, यमन, मालकोश, दरबारी, कान्हडा आदि। राग उन्हें बहुत प्रिय थे। यद्यपि कि उनका कण्ठ हस्सू खाँ के समान मधुर नहीं था, फिर भी उन्होंने अपनी परिश्रम और साधना द्वारा उसे बडा आकर्षक बना लिया था, वे तीनों सप्तकों में तैयारी, सफाई और सुरीली आलाप- तान भरते। वे ख्याल को भरने में अद्वितीय थे। हस्सू खाँ के केवल एक पुत्र था। हददू खाँ की दो शादियाँ हुई थी, पहली से दो पुत्र, मुहम्मद खाँ और रहमत खाँ हुये और दूसरी से दो कन्यायें हुई। पहली पुत्री का विवाह इनायत खाँ से और दूसरी का विवाह बीनकार बन्दे अली खाँ से हुआ।
    • वृद्धावस्था में हददू खाँ के नीचें का भाग शिथिल हो गया था। जब वे दरबार में गाने जाते तो लोग उन्हें उठाकर ले जाते। सन् 1875 में उनका स्वर्गवास हो गया। उनके निधन से ग्वालियर नरेश बडे दुखी हुये और एक हफ्ते तक मौन रहें।

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