allauddin-khan biography

Biography of Allauddin khan-Jivni in Hindi

Biography of Allauddin khan-Jivni in Hindi is described in this post of Saraswati sangeet sadhana .

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Allauddin Khan-Jivni

 

अलाउद्दीन खाँ की जीविनी / Biography of Allauddin khan

                

  • उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ऐसे व्यक्ति थे जिनकों स्वयं संगीत विद्या ग्रहण करने में अनेक कष्ट सहने पडे,किन्तु वे सुपात्र को बडी सरलता से और उदारता के साथ विद्या दान देते थे और वहाँ रहकर संगीत शिक्षा ग्रहण करते थे। ये केवल अच्छे वादक ही नहीं बल्कि कुशल वाइलिन, सुरबहार और सितार वादक भी थे। इतना ही नहीं, ये सभी वाद्य अच्छी तरह बजाते और सिखाते थे।
  • उस्ताद अलाउद्दीन का जन्म सन् 1870 में त्रिपुरा के शिवपुर ग्राम में हुआ। पिता का नाम साधू खाँ तथा बाबा का नाम मदार खाँ था। इनके पिता को संगीत से बडा अनुराग था। वे सितार बजाते थै और उन्होंने सितार शिक्षा कासिम अली खाँ से प्राप्त की थी। जिस समय साधू खाँ सितार बजाते, बालक अलाउद्दीन पास बैठकर ध्यान से सुनते और स्वयं कुछ गुनगुनाने लगते। इस प्रकार इन्हें संगीत सीखने की प्रेरणा इनके पिता से मिली जो दिन प्रतिदिन बढ़ती गई।

शिक्षा – 

  • एक पाठशाला में इनका नाम लिखवा दिया गया, किन्तु पढने- लिखने में इनका मन नहीं लगा और पाठशाला छोड़ दी। उसके बाद इन्हें कलकत्ता जाकर संगीत सीखने की धुन सवार हुई। उम्र कम थी,लेकिन अलाउद्दीन बहुत दृढ़ प्रतिज्ञ थे।घर से निकल पड़े और कलकत्ता जा पहुंचे। वहाँ पेट भरने का कोई साधन नहीं था, सिवा इसके कि भिखारियों के साथ नि:शुल्क भोजन ग्रहण करें। पुरानी कहावत है कि मरता क्या न करता। दिन में एक बार भोजन करके ही संतुष्ट रहते। सोभाग्य वश इनकी भेंट गोपाल कृष्ण भट्टाचार्य से हुई, जिनसे इन्होंने गायन सीखना शुरू किया। इसी बीच ये वहाँ नन्दा बाबू से तबला और पखावज की भी शिक्षा लेते रहे।
  • सात वर्षों तक सिखाने के बाद गोपाल कृष्ण की मृत्यु हो गई। कुछ दिनों के बाद इनका परिचय स्वामी विवेकानंद के भाई अमृत लाल दत्त से हुआ, उनसे इन्होंने वाइलिन, क्लेरोनट और बांसुरी बजाना सीखा। इतना सब कुछ सीखने के बाद भी इनकी संगीत पिपासा शांत नहीं हुई और ये सदैंव कुछ और सीखने के लिए लालायित रहते थे।
  • इनकी भेंट दमदम, कलकत्ता के स्व० अहमद अली खाँ से हुई। वे अपने समय के एक प्रसिद्ध सरोद- वादक थे। उनसें सीखने के लिए इन्होंने प्रत्येक प्रकार के कष्ट सहे और बडी सेवा करने के बाद अहमद खां जब अलाउद्दीन से बहुत खुश हुए तो इन्हें सरोद सिखाने लगे। कुछ समय के पश्चात वे इन्हें रामपुर( उत्तर प्रदेश) ले गये और बोले कि जो कुछ मुझे आता था मैंने सिखा दिया, अब तुम उस्ताद वजीर खाँ से सीखों इतना कहकर वे वहां से चले गए और अलाउद्दीन को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया।
  • रामपुर में भी इनका समय बहुत कष्टमय बीता। वहाँ इनके रहने – खाने – पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी। किसी प्रकार एक मसजिद के कोने में सो जाते और जो कुछ भी मिल जाता खा लेते। कभी कभी भूखा भी रहना पडता। तब ये अपने जीवन से इतने निराश हुए की आत्महत्या तक करने को सोचा। इसी बीच इनकी मुलाकात एक मौलवी से हुई जिसने इनके दिल में इतना उत्साह भर दिया  कि आत्महत्या का विचार त्याग दिया और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए फिर आगे निकल पड़े।
  • इन्होंने वजीर खाँ से भेंट से करने की कोशिश की किन्तु असफल रहे तब इन्होने एक युक्ति निकाली। नवाब रामपुर की बग्घी एक शाम को गुजर रही थी। तब अलाउद्दीन उसके सामने आकर खडे हो गये।बग्घी रूक गई और इनको नवाब के सामने लाया गया। इन्होंने सब वृतात कह सुनाया जिससे नवाब साहब बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अलाउद्दीन के रहने और खाने पीने की व्यवस्था करा दी। और वजीर खाँ को बुलाकर इन्हें संगीत सिखाने के लिए कह दिया। इससें आपको कुछ संतोष मिला। आप रोज उनके घर जाने लगे, किन्तु किसी दिन भी उनके दर्शन प्राप्त नही हुये। इस प्रकार काफी महीने बीत गए। अन्त में वजीर खाँ ने आपको एक दिन अपने पास बुलाकर कहा कि अभी तक मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था, तुम इसमें सफल हो गये। तुमकों मैं संगीत शिक्षा दूंगा। यह सुनकर अलाउद्दीन बडे प्रसन्न हुए। उन्होंने वजीर खाँ से सरोद, सुरसिंगार बजाना सीखा और उन्हीं से ध्रुपद- धमार की बहुत सी बंदिशें प्राप्त की। इस प्रकार इन्होंने अनेक प्रसिद्ध संगीतज्ञों से बडे कष्ट सहते हुए संगीत ज्ञान अर्जित किया। इसी बीच रामपुर के नवाब विदेश से उच्च शिक्षा लेकर स्वदेश लौटे। विदेश में विदेशी वृन्दावन परम्परा देखने के बाद अपने यहां आर्किष्ट्रा तैयार कराया उसमें अलाउद्दीन को बेला बजाने का अवसर प्राप्त हुआ। इनके बेला वादन से सभी लोग प्रसन्न हये। उस समय से आपको धीरे धीरे कीर्ति मिलने लगी।,लेकिन आप में आगे सीखने की भावना कम न हुई। आप समय समय पर अपने निवास स्थान पर संगीत का कार्यक्रम करते और अच्छे अच्छे गायक और वादकों को आमंत्रित करते। आप उनका कार्यक्रम बडे ध्यान से सुनते और उनके चले जाने के बाद स्वयं उन चीजों को निकालने की चेष्टा करते। इस प्रकार उन्होंने गायन और वादन का भंडार एकत्रित किया।

कार्य-

  • वजीर खाँ ने एक दिन जब आपसे कहा कि तुम्हारी तालीम अब पूरी हो गई है। अब तुम्हारे लिये भ्रमण लाभकर होगा, तो गुरु का आशीर्वाद लेकर आपने रामपुर छोड़ दिया और कलकत्ता जा पहूंचे। वहाँ आपने अपना कार्यक्रम दिया और प्रसंशा प्राप्त की। कुछ दिनों के बाद आपको मैहर रियासत में नौकरी मिल गयीं, जहाँ आप स्थायी रूप से रहते रहे।
  • रियासत में नौकरी करते समय आपने उदय शंकर की पार्टी के साथ इटली, बेल्जियम, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों का भ्रमण किया। आपको सिखाने में बडी रूचि थी। आपने अपनी पुत्री अन्नपूर्णा को सितार और सुरबहार, पुत्र अली को सरोद और पंडित रविशंकर को सितार की शिक्षा दी। इसके अतिरिक्त उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने अनेक शिष्यों को उदारता के साथ सिखाया। इन्होंने अनेक संगीत सम्मेलनों तथा आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से अपना कार्यक्रम प्रसारित किया। इन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है।
  • मुसलमान होते हुए भी ये बहुत सात्विक और शाकाहारी थे। आपको मैहर की शारदा देवी में बडी आस्था थी जिनका दर्शन करने रोज जाते थे। इनके घर में श्रीराम, कृष्ण, हनुमान, सरस्वती आदि देवी देवताओं के अनेक चित्र लगे रहते थे। विदेशों में भी इन्हें अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए।

मृत्यु-

  • इनके वाइलिन, सरोद और सुरबहार के अनेक रिकॉर्ड बन चुके है। जो यदा कदा आकाशवाणी से प्रसारित होते। थोड़ी सी अस्वस्थता के बाद इनकी मृत्यु 6 सितंबर 1972 को हो गई। संगीत जगत आपकी संगीत निष्ठा और संगीत सेवा को कभी भुला नहीं सकता।

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